बुधवार, 10 मार्च 2010

भारत-माता: जय हो!!!

महिलाओं को बधाइयाँ...और शुभकामनायें... पता नहीं क्यों मैं आरक्षण का विरोधी होते हुए भी महिला आरक्षण विधेयक के पास होने का इन्तजार कर रहा था... इसका कारण यही है कि जब सभी जाति-जनजातियों को आरक्षण मिल ही रहा है तो समाज के आधे हिस्से को जो सबसे ज्यादा पिछड़ा है, अनेक प्रकार के बन्धनों से जकड़ा है उसे क्यों नहीं आरक्षण मिले!!!

जानता हूँ कि राज्यसभा में बिल का पास होना कोई अचीवमेंट नहीं है, लोकसभा में इसका पास होना एक परीक्षा होगी सरकार के लिए, राजनीतिक दलों के लिए, देश की  प्रगतिशील महिलाओं एवं महिला संगठनो के लिए... लेकिन मुझे हमेशा से सोनिया गाँधी में यकीं रहा है क्योंकि मैं मानता हूँ कि भारत की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को उन्होंने ही पुनर्जीवित किया और अपने दल की भलाई के लिए प्रधानमंत्री पद का त्याग भी कर दिया... हमारे आदरणीय अटल बिहारी वाजपेई भी पद लोभ से खुद को बचा नहीं पाए थे... अब यह कहना कि वास्तव में सोनिया जी ही प्रधानमंत्री हैं लोगों की संकुचित मानसिकता का परिचायक है... ऐसा तो कितने ही पुरुष किया करते है... लालू प्रसाद सबसे बड़े उदाहरण हैं इसके... हाह! सोनिया जी को हार्दिक बधाई इस बिल को आगे ले जाने के लिए...

राज्यसभा में दो दिनों तक जो हुआ वह परिचायक है राजनीति के पतन का... लोगों को समझना होगा कि हम आखिर किन्हें भेज रहे है संसद में... राजनीति कोई गाय-भैंस नहीं है जिसे लाठी के बल पर हांका जाये... इसलिए हमें सोचना होगा कि चुनाव करने का हक हमें मिला है तो सोच-समझ कर वोट डालें... अंतत: जो हुआ वह अनुचित नहीं था क्योंकि जिसे जो भाषा समझ में आये उसी में समझाना पड़ता है... मुंह से कोई भी बोले कि वो महिला आरक्षण के विरोधी नहीं है, सच यही है कि उन्हें अपनी गद्दी छूटने का डर सताने लगा है... मेरे ख्याल से लोकसभा में भी बल प्रयोग करने की आवश्यकता पड़े तो करना चाहिए... लोकतंत्र चलता है बहुमत से और अल्पमत पक्ष को अधिकार नहीं है कि बलप्रयोग से कार्य रोकें... उनकी जो मांगे है उन्हें लोकतान्त्रिक तरीके से संसद के बाहर और भीतर पेश किया जाना चाहिए...

यह बिल महिला सशक्तिकरण का एक अच्छा प्रयास है... एक तिहाई सीटों पर महिलाएं होंगी तो सदन में उनकी आवाज कुछ तो सुनी जाएगी... विरोध के लिए विरोध करना हो तो यह कहा जा सकता है कि अगली बार वह सीट आरक्षित नहीं रहेगा तो महिलाओं को आपने क्षेत्र से लगाव नहीं  होगा... परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि एक सीट पर २०-३० उम्मीदवार तो चुनाव लड़ेंगी ही और कम से कम दो-तीन महिलाएं तो होंगी जो योग्य और वास्तविक उम्मीदवार होंगी... और अगली बार चुनाव लड़ने की मनाही तो नहीं ही होगी... यदि उन्होंने कार्य किया और लोगों ने पसंद किया तो उनकी उम्मीदवारी अगले बार भी संभव है... इसलिए उनके लिए दरवाजा बंद नहीं होगा... मेरे विचार में इस प्रकार पंद्रह वर्षों लगभग ५०% तक महिला सांसद लोकसभा में दिख सकती हैं... वाह स्वप्नदर्शी...