बुधवार, 18 नवंबर 2009

है कुछ कहने को?

कौन कहता है मैं अकेली हूँ
लहरों से जूझती नाव में कितनी तड़पती साँसें हैं
जो कहती हैं
इस सत्य के साथ मैं भी हूँ
बदलने की चाह रही
पर बदला कुछ नहीं ......
क्या सिर्फ पुरुष प्रधान समाज ज़िम्मेदार है?
क्या वे औरतें नहीं,
जो सबसे पहले पुरुष के बनाये नियमों को
अपनी गरजती आवाज़ देती हैं?
खुद निकल नहीं पायीं
तो नयी किरणों के रास्तों को बन्द करती हैं !
या जो आवाज़ सुनाई देती है
वह अपने लिए राजनीति के द्वार खोलती हैं
कोई फर्क नहीं पड़ता
किसके खून नज़र आ रहे
किसके खून जम गए
कौन पत्थर हुआ
कौन बुत बना..........................है कुछ कहने को?


15 टिप्‍पणियां:

sangeeta ने कहा…

rashmi ji,


खुद निकल नहीं पायीं
तो नयी किरणों के रास्तों को बन्द करती हैं !
या जो आवाज़ सुनाई देती है
वह अपने लिए राजनीति के द्वार खोलती हैं

bilkul sahi kaha aapne....purushpradhan samaj men hum purushon ko hi dosh dete hain ..jabki dekha gaya hai ki naari hi naari ka shoshan adhikta se karati hai....sateek rachna ke liye badhai

indu ने कहा…

bahut kuchh hai kahne ko ,par.....kya 2 aur kitni baar ?
udaipur nikal hi rahi hun ,aane par apne views .....
haan ,jb bhi likhti hain aap jwalnt prshn hote hain .
sochne ko badhya karte hai yhi baat aapko dusaron se alg karti hai ....

surinder ने कहा…

क्या सिर्फ पुरुष प्रधान समाज ज़िम्मेदार है?
क्या वे औरतें नहीं,
जो सबसे पहले पुरुष के बनाये नियमों को
अपनी गरजती आवाज़ देती हैं?
खुद निकल नहीं पायीं
तो नयी किरणों के रास्तों को बन्द करती हैं !
या जो आवाज़ सुनाई देती है
Ek kadva sach hai.....kisko dosh den ?
Surinder

अजय कुमार ने कहा…

बदलने की चाह रही
पर बदला कुछ नहीं ......

जरूर बदलेग अगर एक औरत दूसरी औरत का साथ दे तो----

ρяєєтι ने कहा…

sacchaai liye satik shabdo se badhi rachna...
बदलने की चाह रही, पर बदला कुछ नहीं ......!
haath se haath mile, saath ko saath mile to nothing impossible....ILu..!

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

shama ने कहा…

Baat sahee hai..shat pratishat...hame sanskar jahan se milte hain...hamaree mansiktaka strot waheen se niklta hai...prathayen kaheen any jagahse niryaat nahi hoti...jo hai, wo hamare aaspaas bikhra pada hai...zalim kuritiyon ki zimmedaaree ham sabhee ke oopar hai..

संजय भास्कर ने कहा…

कौन कहता है मैं अकेली हूँ
लहरों से जूझती नाव में कितनी तड़पती साँसें हैं
जो कहती हैं

LAAJWAAB

Murari Pareek ने कहा…

ye bhi sahi baat hai ! ekjut honaa padega mahilaaon ko!!!

Nirmla Kapila ने कहा…

बदलने की चाह रही
पर बदला कुछ नहीं ...
जरूर बदलेगा ,बदल रहा भी है अपना और अपनी दादी या माँ का जमाना देखें तो बहुत कुछ बदल गया है। अच्छी रचना है बधाई

Shefali Pande ने कहा…

क्या वे औरतें नहीं,
जो सबसे पहले पुरुष के बनाये नियमों को
अपनी गरजती आवाज़ देती हैं?
bahut sahee kaha ...

SACCHAI ने कहा…

" kadvahat bhari sacchai ..kise dosh de hum ."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

Babli ने कहा…

जो सबसे पहले पुरुष के बनाये नियमों को
अपनी गरजती आवाज़ देती हैं?
खुद निकल नहीं पायीं
तो नयी किरणों के रास्तों को बन्द करती हैं !
बहुत सुंदर और शानदार रचना लिखा है आपने ! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! आपने सच्चाई को बखूबी प्रस्तुत किया है!

Dr. shyam gupta ने कहा…

हां सत्य है, स्त्री के शोषण, उत्प्रीणन में सदैव स्त्री ही सहायक होती है, यदि स्त्री ( किसी भी रूप भाव में) साथ न दे तो पुरुष किसी भी काम में आगे नहीं आ या जा सकता।----बहुत सुन्दर विचार, बधाई।

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji,
streeyon kee nimn sthiti keliye sirf purush warg ko dosh dena munaasib nahi, kyuki purushon ke banaye niyam ko aurton ka mook samarthan sadaa se raha hai. kuchh jyadti to aurto ne jyada ki hai purushon ki tulna mein. naari hokar naari ka shoshan... jaise ki dahej ki kupratha, parda pratha, bhrun hatya, baalak-baalika mein vibhed...bahut sahi kaha hai aapne...

क्या वे औरतें नहीं,
जो सबसे पहले पुरुष के बनाये नियमों को
अपनी गरजती आवाज़ देती हैं?

shubhkamnayen.