मंगलवार, 17 नवंबर 2009

सवाल अस्तित्व का.............

एक सवाल बचपन में मेरे दिमाग में उठता था, मेरी माँ ने अपना सरनेम अवस्थी क्यों लिखा? मामा तो अवस्थी नहीं हैं, नाना भी नहीं...तब? कुछ बड़ी हुई तो समझ में आया की शादी के बाद सरनेम बदल जाता है. बाद में देखा , कई जगह नाम भी बदल जाता है. मेरी मित्र है , संगीता, शादी के बाद ससुराल में उसका नाम भी बदल दिया गया. २३ वर्षों तक संगीता शर्मा के नाम से जानी जाने वाली लड़की अचानक ही जया मिश्र हो गई थी. २३ वर्षों की पहचान चंद पलों में बदल दी गई. इस नए नाम के साथ तादात्म्य बिठाने में, नई पहचान को स्वीकारने में उसे काफी वक्त लगा.
हमेशा सोचती हूँ, की इस प्रकार किसी की पहचान को मिटा देना ठीक है क्या? मुझे तो खुद के अस्तित्व को मिटा देने जैसा लगता है ये .. २३-२४ साल तक अपने आप को एक सांचे में गढ़ने, अपनी पहचान कायम करने के बाद अचानक ही नए सिरे से पहचान बनाने की कवायद!! अमूमन तो दोबारा खुद की पहचान बन ही नहीं पाती, बनती भी है तो मिसेज़ मिश्र, मिसेज़ शर्मा, मिसेज़ सिंह या अन्य कोई मिसेज़........कई बार केवल फलाने की बहू या फलाने की भाभी....खुद का अस्तित्व नगण्य हो जाता है. पति की अनुगामिनी बनी लड़कियां अपना नाम-पहचान भी पति को सौंप देतीं हैं. कई बार तो लडकियां ख़ुशी से इन स्थितियों को या परिवर्तनों को स्वीकारतीं हैं, लेकिन कई लड़कियों के लिए ये बहुत तकलीफदेह स्थिति और कई बार विवाद की स्थिति भी बन जाती है. नव विवाहिता द्वारा अपने सरनेम को यथावत इस्तेमाल करने की इच्छा अधिकांशत: ठुकरा दी जाती है. यदि नई बहू इस नियम के खिलाफ जाए तो फिर देखिये उसका कैसा प्रशस्ति गान किया जाता है!!

खुद मुझे अपने नाम को बचाए रखने के लिए, अपने सरनेम को लगाये रखने के लिए ज़द्दोज़हद करनी पड़ी है, तब जबकि हमारा परिवार बहुत शिक्षित और उच्च पदाधिकारियों का परिवार है. लम्बे समय तक मेरे द्वारा "अवस्थी" का इस्तेमाल करने पर परोक्ष और कभी-कभी प्रत्यक्ष भी टीका-टिप्पणी हुई. जबकि दोनों परिवारों का मान रखने के लिए मैंने दोनों सरनेम अपनाए हुए थे. लेकिन अब परिवार ने इसे स्वीकार कर लिया है, अनमने ढंग से ही सही.
तो मुझे लगता है की जब शादी के बाद लड़कों के नाम या सरनेम परिवर्तन की कोई व्यवस्था नहीं है, तो लड़कियों को भी उनका सरनेम स्वेच्छा से लिखने या बदलने का अधिकार दिया जाना चाहिए. जिस प्रकार लड़कों को उनके पिता का नाम चलाने का हक़ है क्या उसी तरह का हक़ लड़कियों को नहीं दिया जाना चाहिए? कम से कम ये मसला स्वैच्छिक तो होना ही चाहिए.

21 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार ने कहा…

आपकी बात से पूरी तरह सहमत
समान अधिकार होना ही चाहिये

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपका प्रश्न वाजिब और विचारणीय है ........... सदियों से पुरुष सत्ता का अहम छाया हुवा है दुनिया पर और इसी के चलते ऐसी बीमार मान्यताओं का चलन हमारे समाज में हुवा होगा ....आज ऐसी सब बातों को दुबारा नये सिरेसे देखने की है .... अच्छा लिखा है आपने ..........

मनोज द्विवेदी ने कहा…

Behad achchha likha hai. lekin mujhe aap jaise padhi-likhi aur uchch adhikari ke pariwar wali ladki se aisi bat sunne ki apeksha nahi thi. aap logo ko pahchan ki kya jarurat hai? behtar ye hoga ki gaon ki garib, anapadh aur vikas se koso dur jindagi ki chakki me pis rahi mahilaon ki pahchan ke bare me sochiye, likhiye. purush aur mahila ke bich jis tarah ki vibinntayen uparwale ne di hai. pahle use hi badlawa dijiye phir aap samajik swatantrata ki bat karein. nirasha hath lagi apki lekhni padhkar. ye mat sochiye ki main purush hu isaliye apse aise kah raha hu. Mahilao ka behad samman karta hu. unhe har tarah ki ajadi ka nahi balki unki har tarah ki gulami ke khilaf rahta hu. mansik gulami sabse khatarnak hoti hai. isse bachiye...

Sunita Sharma ने कहा…

वन्दना जी
आपने एक दम सही बात उठायी यह लडाई मै भी लड रही हूं कोई अपना अस्तित्व कैसे नकार सकता है।मै खुद अपना सरनेम शर्मा ही लगाती हूं विवाह पूर्व भी यही लिखती थी इसके लिए मुझे जबाव देते नही थकता था आप के विचारों से मै सहमत हूं....

M VERMA ने कहा…

तो मुझे लगता है की जब शादी के बाद लड़कों के नाम या सरनेम परिवर्तन की कोई व्यवस्था नहीं है, तो लड़कियों को भी उनका सरनेम स्वेच्छा से लिखने या बदलने का अधिकार दिया जाना चाहिए.'

लडाई तो फिर भी वही अटकी नज़र आ रही है. आखिर यह सरनेम हो ही क्यों?

Murari Pareek ने कहा…

बिलकुल सही सवाल उठाया है !!! ये काफी तकलीफदेह लगता है की बलिदान चाहे नाम का हो चाहे अपनी भावनाओं का हो औरत को करना पड़ता है !!!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मनोज जी, यह मेरा व्यक्यिगत मामला नहीं है. सवाल पूरी महिला जाति का है. अपना उदाहरण तो सिर्फ़ इसलिये दिया कि जब शिक्षित परिवार होने के बावजूद मुझे इस सोच को बदलने में दिक्कत हुई तो कम पढे-लिखे या पूर्ण्त: अशिक्षित परिवारों की महिलाओं का क्या कहूं? यह लडाई केवल मेरी नहीं है, सम्पूर्ण स्त्री-जाति की है.

shama ने कहा…

Sawal sahee hai...aaj dheere,dheere isme badlaav ana shuru ho gaya...meree beteene apna naam nahee badlaa...nahi uspe wo dabaav pada...aue ek achhee baat..uska pati uske kaam ke lihaz se rahne ke liye desh chunega..chashme -bad-door!

Aalekh ke liye bahut, bahut dhanywad!

SACCHAI ने कहा…

" aapne samaj ke is jwalant SAWAL ko jis tarah se uthaya hai vo kabile tarif hai ."

" bahut hi dilchasp aur utana hi gambhir sawal .. "

" aapke dwara jis tarha se is aalekh ki peshkash hui hai vo kabile tarif hai ."

" SAMAJ KE ,.... nari ke is prashn ko leker kuch to sochana hi chahiye hume ."

------ eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

रश्मि प्रभा... ने कहा…

रघुकुल रीत सदा चली आई
सीता की खोज हुई
राम .........!!!!!!!!!!!!
मैं तो मानती हूँ प्यार,विश्वास को,अगर आपसी samajh है तो क्या फर्क
पड़ता है सरनेम से? सात फेरों का अर्थ भी तभी है, जब आपसी samajh हो......
फिर अब तो इस पचड़े में पड़ना भी नहीं चाहिए , पहले स्त्री अनपढ़ थी तो एक मुकुट यानि
सरनेम पहना दिया जाता था , अब तो वह खुद प्रज्ज्वलित है.......

sangeeta ने कहा…

vandna ji,

aapka prashn bahut uchit hai...ek jagrookta lane wala lekh hai....bass kuchh paramparayen chali aa rahi hain...lekin sach hai ki vyakti ki pahchaan zaroori hai....achchha lekh hai ..sochane par majboor karta hua....badhai

अर्कजेश ने कहा…

यह स्‍त्री की अस्मिता से जुडा हुआ है । औरत को स्‍वतंत्रता होनी चाहिए मनचाहा नाम और उपनाम जोडने की ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

चलिए कम से कम हम तो दोषी नहीं है !
कम से कम पूर्ण रूप से तो नहीं !

anuradha srivastav ने कहा…

चाहे कितने ही बोद्धिक वादी बन जायें । सब उम्मीद तो यही रखते है कि लडकी को सरनेम बदलना ही चाहिये। अक्सर ऐसा होता भी है पर किसी ना किसी रुप में यह कसक मूंह बिराती ही है।

वन्दना ने कहा…

vandana ji
aapne bahut hi jwalant mudda uthaya hai......vaise har stri ko ye adhikar hona chahiye ki wo kya kare aur kya nhi , us par samaj ya paramparaon ke naam par kuch thopna nhi chahiye........vaise kuch mahinon pahle maine isi vishay par paper mein padha tha tab shayad aapki baat ko hi protsahan milega magar is raah mein bhi abhi kafi jatiltayein hain vaise suna hai ki kanoon to ban gaya hai shayd jab aishwarya rai ki shadi huyi thi tab is bare mein paper mein aaya tha aur usi mein is kanoon ke bare mein bhi likha tha .........ab jagriti to aa gayi hai magar thoda waqt aur lagega jab mahilayein apne adhikaron ke prati sachet ho jayengi.

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

कभी मैंने भी इसपर पोस्ट लिखी थी, मैंने नाम नही बदला ..हाँ मुझे टोका कम ही किसी ने ..क्योंकि सब मुझे बचपन से जानते थे की मेरी "नहीं " का मतलब नही ही होता है ...अच्छा लगा आपने इस विषय पर लिखा.

शरद कोकास ने कहा…

विवाह के पश्चात मैने लम्बे समय तक् अपनी जीवनसंगिनी लता विश्वकर्मा को अपना नाम नहीं बदलने दिया । कुछ समय बाद हुआ यह कि उनके स्कूल स्टाफ के लोग और अन्य लोग मुझे विश्वकर्मा जी कहने लगे । बाद मे श्रीमती जी को लगा कि यह कुछ गडबड हो रहा है सो उन्होने ऑफ़िशियली अपना नाम बदल लिया हाँलाकि अभी भी सारे लोग उन्हे विश्वकर्मा मैडम ही कहते हैं । वैसे मैने भी प्रस्ताव दिया था कि मै अपना नाम बदल कर शरद विश्वकर्मा करना चाहता हूँ ..लेकिन लोगो ने मुझे मनोचिकित्सक के पास भेजने की तैयारी कर ली सो ..फिर मै अपने पुराने नाम मे ही रह गया ।वैसे अभी तक तो यह तरीका ही ठीक लग रहा है जैसे वन्दना जी ने किया है वन्दना अवस्थी दुबे , या उषा वैरागकर आठले > धन्यवाद - आपका शरद कोकास विश्वकर्मा

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सही शरद जी. ऐस ही कुछ उमेश जी, मेरे पतिदेव के साथ भी हुआ. बहुत से लोग उन्हें अवस्थी जी कहने लगे थे.लेकिन मैने किसी को भी भूल-सुधार करने को नही कहा बल्कि मंद-मंद मुस्कान के साथ इस सम्बोधन से पैदा हुई स्थिति का आनंद लेती रही.

indu ने कहा…

'सरनेम बदले या न बदले'
क्या इसे बदल देने मात्र से किसी की पहचान खो जाती है ?
'गुलाब' गुलाब न होता तो 'गुलाब' नही रहता ?
बच्चिया बड़ी ख़ुशी २ अपना सरनेम बदल लेती हैं
परिचितों के लिए मैं 'इंदु' हूँ ,चाहे गोस्वामी लिखू,पुरी लिखू या द्विवेदी या चतुर्वेदी
क्या फर्क पड़ जाना है ?जो मुझे नही जानते क्या उन्हें फर्क पड़ेगा किमैं सरनेम क्या
लिखती हूँ , नही ना ?
शादी के बाद सबसे ज्यादा जरूरी है आपस मे 'प्यार'
एक दुसरे के लिए ढेर सारा 'प्यार',सबके लिए 'प्यार'
सामंजस्य ,सम्मान तो उसके पीछे पीछे यूँ hi चले आयेंगे जैसे ...
चाँद के साथ चांदनी ,गाय के पीछे बछड़ा .....छोटी सी बात को मुद्दा न बनाओ ,गुडिया रानी
इंदु पुरी गोस्वामी,अवस्थी,शर्मा,वर्मा ,जट ,जटिया ................

Dr. shyam gupta ने कहा…

बिल्कुल सही तर्क है , नाम बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिये, परन्तु बच्चों के सर-नेम का क्या होगा ? मेरे विचार से सर-नेम को ही हटा देना चाहिये सिर्फ़ नाम व काम ।

ज्योति सिंह ने कहा…

aapke is lekh me ek aham sawal tika hai jo samajik niymo ka ulnghan karne me asamarth hai ,sadiyon se chali aa rahi ye rit itni aasani se nahi mit sakti .vyaah kar to ladkiyon ko hi le jaane ki parampara hai ,raja ke niymo ka ulanghan ,aesa sahas karne ki kshamta naari varg me kam hai kyonki isse maika paksh chapet me aa sakta hai phir baaton ki dhaar sanskaro ko kaatne lagegi ,jabki yahan isse kuchh sambandh nahi ,badi vichtr baat hai janni hi anjaan hai ,ye apvaad bina virodh ke paida hi nahi ho sakta ,aap bahut behtar likhti hai
isme koi do rai nahi ,kushi is baat ki hai ki purusho ko bhi is baat ka andaaja hai ,