रविवार, 1 नवंबर 2009

समानता- क्या यह संभव है?

सीता की ज़िन्दगी एक मिसाल बनी , हर घर में सीख की जुबान सीता की ज़िन्दगी !हर बात पे सब कहने लगे 'सीता जैसी बनो"
यानि हर तकलीफ में मौन रहो . जब आदेश हो जाये -अग्नि परीक्षा दो , परित्यक्ता होकर भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करो.......
इतनी सीख और गले तक के अन्याय ने 'समानता ' की बात उठाई . समानता की सशक्त मांग लेकर स्त्री हर क्षेत्र में खड़ी हो गयी,
अपने को मांजकर , निखरकर उसने सिध्ध कर दिया कि नारी दुर्गा का नव रूप है .....
पर समानता?
क्या यह संभव है? शारीरिक संरचना क्या उसे समाज में समान रूप से सुरक्षा, स्वतंत्र स्थान दे पाती है.........आर्थिक रूप से सशक्त
होकर क्या वह समान हो गयी है???????????

22 टिप्‍पणियां:

मानव मेहता ने कहा…

बहुत सही बात उठाई है आपने......
बहुत अच्छा लिखा है, हमेशा की तरह....

Dr. M. P.Mishra ने कहा…

Man and woman are complementary to each other.They are biologically different, hence cannot be regarded as equal.Both of these join to make a whole, None can claim his independent existence.
In Indian societies, men have been neglecting the female identity in terms of rights.Many cases of violence have been reported from time to time.Sita too was a victim of male offence, negligence, and torture.It is interpreted in many different ways in favour of men.This is again unjust.
Women deserve all those rights that men deseve for them.Apart from this, women deserve a lot more- and that is love, respect, care,dignity etc. No woman can fight to gain a good position in society. Rather, she can do it by
changing the composition of her milk she rears her child with.Great awareness building and teaching of moral values is necessary.
in the present poem, the poet has posed a problem before the society to search some permanent solution of this grave Indian social problem.

Economic strength cannot make a woman independent. Rather she cannot be so due to her biological make up. Men too should not think themselves independent, like a child cannot remain independent of her/his mother.Men and women should not be regarded as too separate beings.
Excellent composition.Thank you madam.These thoughts can contribute towards great reformation of our society.Pranam.

kishor kumar khorendra ने कहा…

rashmi ji
namskaar
ekdam sahi kaha hae aapane
aarthik rup se svatantr hokar bhi
nari apane naaritv ke karan
purnt: svtntr ho paayegii isakii sambhavna mujhe to kam hi lagati hae
usake liye ghar ke bhitar sharirik suraksha to milati hi hae
sath hi bachcho ko snehdekar usaki mamta ko santushti bhi prapt hoti hae
itane me hi bahut sa vakt nikal jata hae
mansik rup se sampurn svtantrta ke baare me use vichaar karane ka samay jivan me
kam hi mil pata hae

bahut achchha likha aapane

shama ने कहा…

Dr. Mishra ne bada achha comment kiya hai..
Rashimi ji, abhi to maine ek sarasri nazar dali..'seeta' ke bare me jo likha wo bilkul saty hai...hame bachpanse yahee sikhaya jata hai, chahe wo sahee ho ya galat...lekin mai itminaan se ekbaar phir padh ke comment karungee..

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

आपकी कविता बहुत अच्छी
लगी | रघुवीर सहाय की
याद आ गयी_
''पढ़िये गीता/बनिए सीता
किसी मुर्ख की हो परिणीता
फिर इन सबमे लगा पलीता
भर-भर भात पसाइये |''
सुन्दर कविता के तईं...
आभार ...

संत शर्मा ने कहा…

सुन्दर प्रश्न है : समानता - क्या यह संभव है ?

सर्वप्रथम तो "सीता जैसी बनो" का तात्पर्य यह निकाल लेना की "हर तकलीफ में मौन रहो" नकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है और सीता के राम के प्रति समर्पण को उनकी बेबसी करार देता है, जो अपने आप में एक गंभीर चर्चा का विषय हों सकता है |

जब हम समानता की बात करते है तो हमें निर्धारित करने का प्रयास करना चाहिए की हमें किस तरह की समानता की तलाश है | क्या हम स्त्री और पुरुष के लिए दो अलग - अलग दुनिया बनाना चाहते है जहाँ दोनों अपने आप में ही पूर्ण हों, स्वतंत्र हों, आत्मनिर्भर हों, यदि हां तो नारी को भी पुरुष की तरह ही शारीरिक संरचना सम्बन्धी चिंता से मुक्त होना होगा |

वास्तविकता तो यह है की स्त्री और पुरुष दोनों एक दुसरे के पूरक होते है अतः यह जिद्द नहीं होनी चाहिए की हमारे कार्यक्षेत्र भी समान ही हों वलिक कोशिश यह होनी चाहिए की हम खुद को पहचाने और उस क्षेत्र में खुद को निपूर्ण करें जिसमे हम एक दुसरे की तुलना में बेहतर परिणाम दे सकते है | यदि ऐसा हुआ तभी दोनों का साथ एक पूर्ण और समृद्ध समाज का निर्माण करने में सक्षम हों सकेगा |

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

हिन्दी चिठठाकारीता फले-फुले!!
आपका लेखन प्रकाश की भॉति
दुनिया को आलोकित करे!!
★☆★☆★☆★☆★☆★☆★☆★
जय ब्लोग- विजय ब्लोग
★☆★☆★☆★☆★☆★☆★☆★
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
रश्मि प्रभाजी!
सीता की ज़िन्दगी एक मिसाल बनी , हर घर में सीख की जुबान सीता की ज़िन्दगी !
हर बात पे सब कहने लगे 'सीता जैसी बनो"
बात आपने सत्य ही कही है। अब सीतामाता जैसी सतीत्व प्राप्त लोग कहा रहे?
उनसे तुलना करना सुर्य को हाथ मे पकडने वाली बात है।

समानता- क्या यह संभव है?
कहॉ है असमानताए ?
बिल्कुल आजकी नारी हमारी सोच से कही आगे निकल चुकी है।
यह डर या असुरक्षा की भावना कुछ ही लोगो के मन मे हो सकती है।
बाकी नारीया सभी प्रसन्न है! चिन्ता की कोनोही बात नही।
आपने बहुत ही सुन्दर ढग से विचारो को रखा इसलिऍ आपका भी आभार!
अति सुन्दर विचारो की प्रस्तुती!

आपका आभार
♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
हे प्रभू यह तेरापन्थ को पढे
अणुव्रत प्रवर्तक आचार्य तुलसी
मुम्बई-टाईगर

sakhi with feelings ने कहा…

sahi bat likhi hai acha laga

वाणी गीत ने कहा…

सीता जैसी बनो ...कौन कहता है ऐसा ...आपको पता है सीता की जन्मस्थली में लोग अपनी बेटी का नाम सीता नहीं रखते ...क्यूंकि वे नहीं चाहते की जो दुःख भरा जीवन सीता ने जिया ...उनकी बेटी भी जीए...!!
समानता हो ही नहीं सकती ...जब तक समाज में पुरुष अपना दृष्टिकोण नहीं बदलेंगे ...बदलाव स्त्रियों के स्वभाव में ज्यादा हो रहा है ...और वो भी नकारात्मक ...जबकि होना इसका उल्टा चाहिए ...अपने स्त्रियोचित गुणों में निखर लाते हुए अगर वे समानता हासिल करते हैं ...गर्वोक्ति तभी उचित होंगी ...!!

संतोष कुमार "प्यासा" ने कहा…

जहा तक नारी की समानता की बात आती है
मै इतना ही कहूँगा की कई स्थानों में नारी की समानता को आज भी छीना जा रहा है
उसे आज भी एक खिलौना ही समझा जा रहा है
शायद इसी लिए किसी कवी ने कहा है की -

मजबूरी होती है नारी , किश्मत पर रोती है नारी
लगता है जैसे जीवन में पाकर भी खोती है नारी
जब देखो तब अपने मुह को आंसू से धोती है नारी
अक्सर थक कर और हार कर थोड़ा सा सोती है नारी
पाती है कांटें ही कांटें फूल भले बोती है नारी
दैहिक सुख के चाँद छडों में हीरा या मोती है नारी
परम्पराओं के पिंजरे में चिडया सी होती है नारी
"पर हम ये भूल गए है जीवन की ज्योति है"

GAURAV VASHISHT ने कहा…

behad vicharniye prashn uthaya hai aapne apni is shasakt rachna ke madhyam se..
badhaie

Gaurav Vashisht

Priya ने कहा…

ये शारीरिक संरचना ही तो महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधो का मूल कारण है. ये सिर्फ़ हिन्दुस्तान तक ही सीमित नही है ...बल्कि यूरोपियन देशो में भी महिलाओ के साथ ऐसे अपराध होते है......ये प्रकृति की नाइंसाफी ही है कि उसने स्त्री को शारीरिक रूप से पुरुषों से कमजोर बनाया है..... दो अलग जेंडर है और दोनो की अपनी अहमियत...... लेकिन आदमियों को अपनी सोच अपना नज़रियाँ बदलने की ज़रूरत है.......और किसी भी सोच को एक दिन में नही बदला जा सकता......ये वही भारत भूमि है जहाँ पर गार्गीऔर विध्योतमा जैसी विदुषी महिलायें शास्तार्थ किया करती थी........सभी कलाओं में पारंगत थी ......बाहरी आक्रमणके कारण फिर चाहे अलेग्ज़ॅंडर हो, हून हो, मुगल हो , पुर्तगाली या फिर ब्रिटिशर्स इनके आने के बाद ही भारत में परदा प्रथा शुरू हुई....क्योंकि इनके लिए महिलायें सॉफ्ट टारगेट होती थी.....आज वो सारा मिला जुला कल्चर देश में हैं...... एक नयी सोच, नवनिर्माण और नज़रिए और नैतिकता के साथ पुनः प्रयास करने की आवश्यकता है.

dr'rajendra.prasad.yadav ने कहा…

prashna:kisme samanta,kaisi samanta?shareerik-sambhav nahi ,mansik -thodabahut.phir kya?yah samajik aur arthik hogi.samanta education me,carrier opportunity me ,adhikaro adi me.durga-shakti hai,sita -samarpan bhav,naritwa ka purushtwa ke samakchh jisese sristi chal sake.durga iski rakchha dusto se karti hai .durga na stri hai na purush yah kewal shakti hai.

POTPOURRI ने कहा…

नारी को भगवान् ने शारीरिक तौर से कोमल और मानसिक तौर से पुरुषों से भी अधिक सहनशील बनाया है जिसका समाज ने सदियों से exploit किया और आज नारी की यह दुर्दशा है की उसे अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ रहा है. ये सारे विश्व की परिस्थिति है. अभी हाल ही में मैंने पढ़ा की लता मंगेशकर जी ने अपने एक interview मै कहा की, "अगले जनम मुझे बिटिया न कीजो" तो आम लड़कियों का क्या हाल होता होगा उसका अनुमान लगया जा सकता. इस पुरुष प्रधान समाज मै might is right का नियम बन गया है. इस कलियुग में अब सीता मैया जीतनी सहन शक्ति कहा मेलेगी इस वजह से समाज में morality नहीं रही आर्थिक रूप से सशक्त होकर भी नारी कमजोर ही है Shri Maithili Sharan Gupta had nightly written: "Abla Jeevan Haay Tomahari Yehi Kahani, Anchal mein Hai Doodh Aur Ankhon mein Pani"

POTPOURRI ने कहा…

@Priya, main aapke vicharo se shat pratishat sahmat hun

shama ने कहा…

इतने सब ख़यालात पढ़ते , पढ़ते , मन में काफ़ी कुछ उमड़ घुमड़ के आ रहा है.....कुछ पुरानी यादें , जहाँ अपने औरत होने को लेके अपमान सहना पड़ा ...न चाहते हुए भी ख़ुद को सीता समझ बैठने का आरोप लगा ...जबकि , आरोप लगाने वाला कोई राम न था ..
"हमने सीता होने का दावा तो न किया ,
वो ख़ुद को राम कह गए .."
गर सीता होने का मतलब अपमान सहना है ,तो मै आज खुले आम कहूँ , कि , मै ऐसी सीता बनना न चहुँ ...हाँ , हालात गर ऐसा बना दें , तो बात अलग है...कल किस ने देखा है? इन्हीं सवालात को लेके तो इस ब्लॉग की शुरुआत की॥
पिछली पोस्ट," अर्थी तो उठी" ज़रूर पढ़ें...और अपनी राय दें, ये इल्तिजा है..उस में जो लिखा है,वो एक भयंकर सत्य कथा है...दिल दहला देने वाली..

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://lalitlekh.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सबके जवाब अपनी-अपनी धरती से स्पष्ट और सारयुक्त हैं........
मैं फिर कहूँगी कि अपनी पहचान zaruri है,समानता की होड़
नहीं, भ्रूण-हत्या को रोकना है,अपने को पुरुष की तरह नहीं दिखाना है,
हमारी अपनी पहचान सशक्त है,उसे धूमिल ना होने दें,उससे अपरिचित
ना हों .........
सारी प्रतिक्रियाओं का तहेदिल से स्वागत है

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

जहाँ तक समानता की बात है, या स्वयं समकक्ष होने की बात है , तो आज के परिवेश में इतने बदलाव हो चुके हैं कि ये बातें इतिहास जैसी लगने लगीं हैं.
फिर भी यहाँ यह कहना आवश्यक होगा कि एक ओर पुरुष वर्ग को नारी अस्तित्व की महत्ता को स्वीकारना होगा तो वहीँ दूसरी ओर नारी समाज को भी आज की हरेक कसौटी पर खरा उतरना होगा. उसे घर के बाहर भी निर्भयता पूर्वक आगे बढ़ना होगा.
एक अच्छे विषय के लिए रश्मि जी को बधाई.
- विजय

shama ने कहा…

नारी को समाज एक इंसान,ना देवी नाही दासी..( जो हमारे कथाकार शब्दांकित करते हैं, या, सिनेमा, टीवी पे दर्शाया जाता है...या तो देवी होती है या बदले की आगमे जलती हुई कुलटा)समझे ...
हर नारी के अपने गुण दोषों के साथ यही कामना है ...हम गृह कार्य को अर्थार्जन नही समझते ...गर उसकी कीमत लगायी जाए ( उसे तो मई पेश कीमती समझती हूँ)तो नारी , खासकर भारतीय परिवेश में पली बढ़ी, मध्यम वर्ग की नारी गज़ब,अमूल्य काम करती है ...जिसे हमारा समाज ,' घर बैठना ' कहता है ..!
ek kavita pesh karungee, tippanee ke taurpe..lekin kal..

shama ने कहा…

पेहचाना मुझे?
किसीके लिए हक़ीक़त नही,
तो ना सही!
हूँ मेरे माज़ीकी परछाई,
चलो, वैसाही सही!
जब ज़मानेने मुझे
क़ैद करना चाहा,
मै बन गयी एक साया,
पहचान मुकम्मल मेरी
कोई नही तो ना सही!
किसीके लिए...

रंग मेरे कई,
रूप बदले कई,
किसीकी हूँ सहेली,
तो किसीके लिए पहेली,
मुट्ठी मे बंद करले,
मै वो खुशबू नही,
किसीके लिए...

ज़रा याद करो सीता,
या महाभारतकी द्रौपदी!
इतिहासोंने सदियों गवाही दी,
मरणोत्तर खूब प्रशंसा की,
जिंदगीके रहते प्रताड़ना मिली ,
संघर्षोंमे हुई नही सुनवाई
किसीके लिए...


अब नही चाहिए प्रशस्ती,
नाही आसमानकी ऊँचाई,
जिस राह्पे हूँ निकली,
वो निरामय हो मेरी,
तमन्ना है बस इतनीही,
गर हो हासिल मुझे,
बस उतनीही ज़िंदगी...
किसीके लिए...

जलाऊँ अपने हाथोंसे ,
एक शमा झिलमिलाती,
झिलमिलाये जिससे सिर्फ़,
एक आँगन, एकही ज़िंदगी,
रुके एक किरन उम्मीद्की,
कुछ देरके लियेही सही,
किसीके लिए...

र्हिदय मेरा ममतामयी,
मेरे दमसे रौशन वफ़ा,
साथ थोड़ी बेवफाईभी,
ओढे कई नक़ाब भी
अस्मत के लिए मेरी,
था येभी ज़रूरी,
पहचाना मुझे?नही?
झाँको अपने अंतरमेही!
तुम्हें मिलूँगी वहीँ,
मेरा एक नाम तो नही!
किसीके लिए....

jenny shabnam ने कहा…

रश्मी जी,
बेहद विचारनिये प्रश्न है यह, जिसका जवाब कभी नहीं मिल सकता| पुरुष और स्त्री में शारीरिक भिन्नता प्राकृतिक है, अतः समानता की तो बात हीं नहीं है| शारीरिक असमानता हीं स्त्री को सामाजिक रूप से कमजोर बना देता है, और इस असमानता के कारण हीं स्त्री-शोषण को सामाजिक व्यवस्था बढ़ावा देता है| सामान अधिकार मिले बस इतनी हीं अपेक्षा होती है, परन्तु सदैव हीं स्त्री के इस अपेक्षा को गलत अर्थ में मान लिया जाता है|
आपने बेहद सुन्दर शब्दों में इसे प्रस्तुत किया है| लोगों को सोचने पर विवश करती रचना केलिए बधाई आपको| शुभकामनायें|

Neelima ने कहा…

ham nari hai n proud hai hamko apne nari hone ka .hame nari ke roop mai apni pahchan banani chahiye purusho ko parast karke nhi ............