सोमवार, 23 नवंबर 2009

आईये हाथ उठायें !


पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ ,
इन्सानसे इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?
लौट के आयेंगी बहारें ,जायेगी ये खिज़ा,
रुत बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!

वक़्त आ गया है, कि,हम कुछ कर गुज़रें...हम पे क्या बीती ये बात भुलाके...हम जिन्हों ने रस्में निभाने में काफ़ी समय बिता दिया..२६/११ को एक साल पूरा हो रहा है...भयानक से भयानक स्मृतियाँ उजागर हो रही हैं....उस दिन बहुतसे लोगों ने अपनों को खोया...उनमे से एक मैभी हूँ...मैंने भी ३ बेहद अपनों को खोया...मुंबई में...

आज हर माँ को ललकार रही हूँ,कि, अपने बच्चों को संस्कार दे...दिलों में नफरत ना रखे...हमें इन्हीं बच्चों में से गांधी / गौतम को निर्माण करना है...नफरत के बदले प्यारकी राह पे चलना सिखाना है....कहना है,"इस देश को रखना मेरे बच्चों संभालके..."

अंतर्मुख होके सोंचना है,क्या हम अपनी औलाद को पहले हिंदू या मुस्लिम होने की सीख देते हैं या एक अच्छे इंसान होने की...सच्चे भारतीय होने की ?..यही सीख हमें आतंक का मुक़ाबला करने की दिशा दिखायेगी...एक जुट होना सिखाएगी..एक सच्चा भारतीय ही आतंक से निपट सकता है..हर हाल में देशको आगे रख सकता है..हर स्वार्थ के परे देश हित है..यही बात जनम घुट्टी की तरह औलाद को पिलानी है...

उस दिन के बाद मैंने चाहा था,की, आतंक और उसे लेके बने क़ानूनों से अपनी दुनियाको रु-b-रु कराऊँ...एक छोटी फ़िल्म के ज़रिये...नही कर पाई...लेकिन जज़्बा है..जानती हूँ, कि, क़ानून बेहद घिसेपिटे हैं..लेकिन, अकसर लोगों को इन के बारे में नही पता..." गज़ब कानून" के तहत मैंने लिखा है,जो, इसी ब्लॉग पे हाज़िर है....इल्तिजा है, ज़रूर पढ़ें...

रविवार, 22 नवंबर 2009

कौन हूं मै........?

कृति हूं मै अनोखी 
रचा है मुझे किन लम्हो में
कौन हूं मै क्या हूं मै ?
आज तक न जान पायी
तलाशती वजूद को 

समझ न पायी 
हां एक रूत्री हूं मै !
बनाती हूं घरौदा प्यार से 
रिश्तें सभांलती सम्मान से 

निगाहें सहती हूं ,तमाम
डाह की,भुख की,वासना की
प्रेम की,फरियाद की,
कौन हूं मै क्या हूं मै ?
आज तक न जान पायी
पीड़ा के घाव छिपाती
सुखी हड्डियों ढेर पर बैठी
ताकती उम्मीद से बच्चों को
कभी तो मां याद आये
जीने का हक मांग ,कुल्टा कहलाती 
त्याग कर सुखो का कर्तव्यों को निभाती
देवी पदवी धारती  !
उडना चाहु तो पंख कहां से पाऊ 
कौन हूं मै क्या हूं मै ?
हां बस एक स्त्री हुं मै................! 

बुधवार, 18 नवंबर 2009

है कुछ कहने को?

कौन कहता है मैं अकेली हूँ
लहरों से जूझती नाव में कितनी तड़पती साँसें हैं
जो कहती हैं
इस सत्य के साथ मैं भी हूँ
बदलने की चाह रही
पर बदला कुछ नहीं ......
क्या सिर्फ पुरुष प्रधान समाज ज़िम्मेदार है?
क्या वे औरतें नहीं,
जो सबसे पहले पुरुष के बनाये नियमों को
अपनी गरजती आवाज़ देती हैं?
खुद निकल नहीं पायीं
तो नयी किरणों के रास्तों को बन्द करती हैं !
या जो आवाज़ सुनाई देती है
वह अपने लिए राजनीति के द्वार खोलती हैं
कोई फर्क नहीं पड़ता
किसके खून नज़र आ रहे
किसके खून जम गए
कौन पत्थर हुआ
कौन बुत बना..........................है कुछ कहने को?


मंगलवार, 17 नवंबर 2009

सवाल अस्तित्व का.............

एक सवाल बचपन में मेरे दिमाग में उठता था, मेरी माँ ने अपना सरनेम अवस्थी क्यों लिखा? मामा तो अवस्थी नहीं हैं, नाना भी नहीं...तब? कुछ बड़ी हुई तो समझ में आया की शादी के बाद सरनेम बदल जाता है. बाद में देखा , कई जगह नाम भी बदल जाता है. मेरी मित्र है , संगीता, शादी के बाद ससुराल में उसका नाम भी बदल दिया गया. २३ वर्षों तक संगीता शर्मा के नाम से जानी जाने वाली लड़की अचानक ही जया मिश्र हो गई थी. २३ वर्षों की पहचान चंद पलों में बदल दी गई. इस नए नाम के साथ तादात्म्य बिठाने में, नई पहचान को स्वीकारने में उसे काफी वक्त लगा.
हमेशा सोचती हूँ, की इस प्रकार किसी की पहचान को मिटा देना ठीक है क्या? मुझे तो खुद के अस्तित्व को मिटा देने जैसा लगता है ये .. २३-२४ साल तक अपने आप को एक सांचे में गढ़ने, अपनी पहचान कायम करने के बाद अचानक ही नए सिरे से पहचान बनाने की कवायद!! अमूमन तो दोबारा खुद की पहचान बन ही नहीं पाती, बनती भी है तो मिसेज़ मिश्र, मिसेज़ शर्मा, मिसेज़ सिंह या अन्य कोई मिसेज़........कई बार केवल फलाने की बहू या फलाने की भाभी....खुद का अस्तित्व नगण्य हो जाता है. पति की अनुगामिनी बनी लड़कियां अपना नाम-पहचान भी पति को सौंप देतीं हैं. कई बार तो लडकियां ख़ुशी से इन स्थितियों को या परिवर्तनों को स्वीकारतीं हैं, लेकिन कई लड़कियों के लिए ये बहुत तकलीफदेह स्थिति और कई बार विवाद की स्थिति भी बन जाती है. नव विवाहिता द्वारा अपने सरनेम को यथावत इस्तेमाल करने की इच्छा अधिकांशत: ठुकरा दी जाती है. यदि नई बहू इस नियम के खिलाफ जाए तो फिर देखिये उसका कैसा प्रशस्ति गान किया जाता है!!

खुद मुझे अपने नाम को बचाए रखने के लिए, अपने सरनेम को लगाये रखने के लिए ज़द्दोज़हद करनी पड़ी है, तब जबकि हमारा परिवार बहुत शिक्षित और उच्च पदाधिकारियों का परिवार है. लम्बे समय तक मेरे द्वारा "अवस्थी" का इस्तेमाल करने पर परोक्ष और कभी-कभी प्रत्यक्ष भी टीका-टिप्पणी हुई. जबकि दोनों परिवारों का मान रखने के लिए मैंने दोनों सरनेम अपनाए हुए थे. लेकिन अब परिवार ने इसे स्वीकार कर लिया है, अनमने ढंग से ही सही.
तो मुझे लगता है की जब शादी के बाद लड़कों के नाम या सरनेम परिवर्तन की कोई व्यवस्था नहीं है, तो लड़कियों को भी उनका सरनेम स्वेच्छा से लिखने या बदलने का अधिकार दिया जाना चाहिए. जिस प्रकार लड़कों को उनके पिता का नाम चलाने का हक़ है क्या उसी तरह का हक़ लड़कियों को नहीं दिया जाना चाहिए? कम से कम ये मसला स्वैच्छिक तो होना ही चाहिए.

बुधवार, 11 नवंबर 2009

बने सुपरवोमैन

बने एक सुपरवोमैन (be a superwoman)
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जब जाना हो चांद पर समय हो टेक्नोलॉजी जब वक्त हो ब्लागिंग का तो या दूसरे अन्य क्षेत्रों का तब आज की नारी क्यों एक ऎसी औरत बने जिसके पास असाधारण शक्तिया हो आज की महिला जो उडाती है जेट प्लेन जाती हो अंतरिक्ष में तब इस दौर मे वक्त नही वह अतीत की स्त्रियों की तरह बने उन्हे बनना है एक ऎसी  सुपरवोमेन  जो हर काम में परफेक्ट हो हर मां को सोचना है कि यदि वह एक लडकी की मां है कि कैसे हर परिस्थिति कैसे निपटना है लडकी होना कोई गुनाह नही एक बेटी को जन्म देना फ्रख की बात है क्योकि जो जननी है को जन्म देना एक सौभाग्य है बस जरूरी है उसको पालना इस तरह से परवरिश करना कि वह हर मुकम्मल परिस्थिति में जी सके मुकाबला कर सके डार्विनवाद वैसे भी योग्यतम ही विजय के सिद्वान्त पर चलता है।नारी सक्षात दुर्गा का अवतार होती है उसे अपनी शारीरिक  मानसिक शक्तियों को पहचानना है उसे जरूरत है समाज के सहयोग की परिवार के सहयोग व स्नेह की व अपने जीवन देने वालों के प्रेम की ताकि हर स्त्री सर उठा जी सके हर आम लडकी एक दिन किरन बेदी,सुनीता विलियम्स जैसी बनने का जज्बा रख सकती है यदि सही माहौल व शिक्षा दी जाये । कहते है महिला ही समाज को बनाती व बिगाडती है।

नेपोलियन ने भी कहा था कि "तुम मुझे अच्छी महिला दो मै तुम्हे अच्छे नागरिक दूँगा।"

 

रविवार, 1 नवंबर 2009

समानता- क्या यह संभव है?

सीता की ज़िन्दगी एक मिसाल बनी , हर घर में सीख की जुबान सीता की ज़िन्दगी !हर बात पे सब कहने लगे 'सीता जैसी बनो"
यानि हर तकलीफ में मौन रहो . जब आदेश हो जाये -अग्नि परीक्षा दो , परित्यक्ता होकर भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करो.......
इतनी सीख और गले तक के अन्याय ने 'समानता ' की बात उठाई . समानता की सशक्त मांग लेकर स्त्री हर क्षेत्र में खड़ी हो गयी,
अपने को मांजकर , निखरकर उसने सिध्ध कर दिया कि नारी दुर्गा का नव रूप है .....
पर समानता?
क्या यह संभव है? शारीरिक संरचना क्या उसे समाज में समान रूप से सुरक्षा, स्वतंत्र स्थान दे पाती है.........आर्थिक रूप से सशक्त
होकर क्या वह समान हो गयी है???????????