सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

रश्मि प्रभा जी का सवाल..!

रश्मि प्रभा... said...

क्यूँ नारी शिक्षा की बात उठती है?

क्या शिक्षित नारियां अपने अधिकारों को समझने लगती हैं? क्या उन्हें समाज का डर नहीं रहता?
क्या मात्र शिक्षित हो जाने से उनका अस्तित्व अर्थ ले लेता है? क्या अनपढ़,संवेदनशील स्त्रियाँ अपने अधिकारों की
रक्षा नहीं कर पातीं? मेरी निगाह में उनका वजूद है.......मृत्यु वरण समाज की कायरता पर कालिख पोतना है,
(समाज जो उसके सम्पूर्ण वजूद पर ग्रहण बनता है ).
मेरा तो बस यही कहना है कि......किसी पद पर आसीन हो जाने से अधिकारों की जानकारी नहीं होती,अधिकार था,
है और रहेगा !और हर रौशनी के लिए अपना चिराग खुद रौशन करना होता है !प्रत्याशा,उम्मीदें ....... कोई नहीं सुनता,
कोई नहीं सत्य कहने का साहस रखता है......
अपने सत्य के दीये को प्रोज्ज्वलित करो, आँधियाँ भी रुख बदल लेती हैं !

आईये इसके जवाब खोजें...हम सभी, के लिए ये एक आवाहन है...सामाजिक धारणाएँ कागजात पे बंद पड़े क़ानूनों से नही बदल सकती...वो चेतना जन मानस में जगानी होगी...

9 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सच है. स्त्री को अधिकार दिये गये, लेकिन मखमल में लपेट के. हमेशा कोशिश की गई कि अपने अधिकारों के प्रति वह सचेत न हो सके. सारे अधिकार दूसरे के पास और कर्तव्य स्त्री के पास. अधिकारों के लिये आवाज़ उठाने वाली स्त्रियों को तमाम लांछनों से सम्मानित किया गया. ज़रूरत है अपने अधिकारों को इस्तेमाल करने का. अपने खिलाफ़ कोई सम्वेदनात्मक साजिश न होने देने का.

AlbelaKhatri.com ने कहा…

बहुत आग है............

इस आग को बनाए रखिये..............
अभिनन्दन !

Udan Tashtari ने कहा…

सही है,....

Murari Pareek ने कहा…

बहुत सुन्दर सवाल उठाया है , अपने अधिकार के लिए तो अशीक्षित नारी भी लड़ना चाहती है,

shama ने कहा…

मेरी तरफ़ से यही जवाब है ,की , जन जाग्रति के बिना कुछ नही हो सकता ..'Anti dowry' क़ानून है , लेकिन जब तक समाज में उसके ख़िलाफ़ आवाज़ नही उठाई जाती , बहु -बेटियाँ जलाई जायेंगे...जब तक लेने देने वाले हैं, कोई क़ानून रोक नही लगा सकता...जब तक समाज में से कोई ऐसी घटना के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत नही करता, पुलिस अपने आपसे कुछ नही कर सकती....बेनामी सही, शिकायत दर्ज होना ज़रूरी है...पाठ शाला से इन बातों की शिक्षा मिलनी चाहिए..हमारे अभ्यास क्रम में बदलाव ज़रूरी है...हम आजतक लडिकियों को यही सिखाते हैं,की, चाहे जो हो, उनकी अर्थी पती के घर से उठनी चाहिए..जहाँ वो पली बढ़ी वो जगह उसके लिए पराई हो जाती है, यह कैसी विडम्बना है...

rashmi ravija ने कहा…

नारी शिक्षा तो खैर जरूरी है ही पर इसे रोजगार से अवश्य जुड़ा होना चाहिए... शिक्षा एक दृष्टि,एक सोच तो देती ही है..पर लोग उसका सम्मान नहीं कर पाते, जब तक वह धन उपार्जन से ना जुडी हों...आत्मनिर्भर होकर वह अपने अधिकारों की समुचित रक्षा कर सकती हैं...अनपढ़ स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत होती हैं,क्यूंकि उन्हें मुखर होने में कतई संकोच नहीं होता....शिक्षित स्त्रियों के लिए ये राह,ज्यादा कंकरीली है.ये अक्षरश सत्य है कि...
हर रौशनी के लिए अपना चिराग खुद रौशन करना होता है !प्रत्याशा,उम्मीदें ....... कोई नहीं सुनता,
कोई नहीं सत्य कहने का साहस रखता है......
अपने सत्य के दीये को प्रोज्ज्वलित करो, आँधियाँ भी रुख बदल लेती हैं !...

Sunita Sharma ने कहा…

रश्मि जी
आपकी इस बात बहुत दम है कि अनपढ स्त्रियां अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत होती है उन्हे मुखर होने में कोई संकोच नही। शिक्षित नारी के बोलने पर सैकडों सवाल उठते है कि यह तो पढी लिखी है पर अपने अधिकारो के लिए लडना पडता है....सत्य की राह बडी कठिन है.....

POTPOURRI ने कहा…

meri dharna yeh ki samaj ki soch jab tak nahi badlegi tab tak naari ko chahe vo anpadh ho ya sishikt apne vajud ke liye yuhi ladna padeda aur main samajhti hun ki naari jitni vartman mein asurakshit aur upekshit hai vo pahle utne na thi. is materialist dushit samaj mein ek kranti ko lana bahut jaroori hai. hanare desh mein itne mandir-masjid aur puja ke kai aur stal hai, sant-sadhu hai samaj sevak/sevikaye he phir bhi naari ke prati atyachar bad raha hai. ha main manti hu naari padh kar apne adhikaro se avagat ho jati hai par samaj use apne adhikaro se vanchit rakhta hai is liye samaaj ki soch ki badlna hoga hum jaise sishikt naariyo ko.

Dr. shyam gupta ने कहा…

रश्मि जी ने बहुत सही कहा , पढ लिख कर व्यक्ति तुरन्त आवाज़ निकालने मेन बहुत आगा-पीछा सोच्ता है, अशिक्षित लडकियां अधिक बोल्ड होतीं हैं, बात शुचि आचरण, न्याय व सत्य पर चलने की है, दोनों ओर से --सही कहा --सत्य की आंधियां हवाओं का रुख मोड देतीं हैं, पर दोनों ओर हो आग बराबर लगी हुई।