रविवार, 27 सितंबर 2009

कुछ सवालों के जवाब...

शरद जी ने कुछ सवाल किए थे...अपनी इस पोस्ट के ज़रिये उनके कुछ जवाब दे रही हूँ:

१) मानसिक प्रताड़ना: हाँ..ये सबसे भयंकर प्रताड़ना है, जिसके सुबूत जुटाना बड़ा मुश्किल काम है। शारीरिक प्रताड़ना के जुटाए भी जा सकते हैं.
इस प्रताड़ना को मध्यम वर्गों में सबसे अधिक पाया जाता है। निम्न वर्ग में शारीरिक प्रताड़ना दिख आती है। उच् वर्ग में सही नही जाती...गर स्त्री के पास उपाय हो या मायके से मिली जायदाद हो तो वह अपने घरसे निकल सकती है, ब-शर्ते के, मायके वाले उसपे लौट जाने की ज़बरदस्ती न करें( जैसे कि, मैंने, 'अर्थी तो उठी...' इस आलेख में लिखा था। )
निम्न वर्ग के प्रताड़ना के प्रती प्रतिक्रियाका एक उदहारण देती हूँ। मेरी किसी रिश्ते के बहन के घर , उसकी प्रसूती के बाद, मालिश करने एक औरत आती थी। एक दिन बहन ने उसे पूछा :
" तुम्हारे परिवार में कौन लोग हैं? "
औरत: " मेरी ५ बेटियाँ हैं। २ की शादी हो गयी हेई। ३ पढ़ रही हैं।"
बहन :" और पती? वो क्या करते हैं?"
औरत : " वो तो मर गया"।
बहन : " अरे अरे...!"
औरत : " ये अरे, अरे कायको बोलती ? अच्छा हुआ मर गया। मै कमाती थी..वो शराब पीता और मुझे पीटता...वैसे मै भी, चूल्हे से लकडी निकल मार देती...मर गया पी, पी के..उसके बाद तो मै एकदम मजे से रहती...लडकी लोग का शादी बनाया...जेवर बनाया...३ लडकी पढता...देखो, तुमसे मै १००० रुपये महिना लेती...और ५ जगा काम करती...सब जन मेरेको तीज त्यौहार पे टिप देता..उसमे से गहना बनाती..."

यह बात २५ साल पूर्व की है...५००० रुपये माह कमाना मायने रखता...इतना तो एक मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा महिला भी उन दिनों नही कमा सकती थी...! ना तो इस तरह का उत्तर दे सकती थी....

२) मध्यम वर्गीय महिलाएँ जाय तो कहाँ जाय ? इसलिए पुलिस महकमें में महिला सलाह गार समिती होती है, जो इसतरह के पारिवारिक अत्याचार या प्रताड़ना से निपटने की कोशिश करती है।
आधार गृहों की कमी है। महिलाएँ अपने साथ बच्चे नही रख सकतीं...येभी एक कारण है,कि, औरत प्रताड़ना सह जाती है।
गर लड़का हो तो वो ५ साल का होने के बाद बाल सुधार गृह में भेज दिया जाता है। वहाँ उसपे क्या संस्कार होते होंगे,ये सब समझ सकते हैं...बच्चे वहाँसे भाग ने की कोशिश में रहते हैं। गुनेहगार बन जाते हैं।

३) मध्यम वर्गीय महिला पे अडोस पड़ोस वाले या घरवाले ही दबाव डालते हैं, कि, वो'अपघातन जल गयी...' यही जवाब दे..वरना उसके बच्चे भी अनाथ हो जायेंगे...

४) कई बार घरमे ही किसी की हत्या पती करता है, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारी पत्नी को लेनी पड़ती है...' पती तो परमेश्वर होता है...तू उसके ख़िलाफ़ कैसे बोल सकती है? नरक मिलेगा नरक'...या फिर तेरे बाल बच्चों की देखभाल कौन करेगा ?' यह कहके उसे चुप कराया जाता है।

५) गर किसी महिला को किसी ना किए अपराध के लिए कारावास में डाल दिया हो तो, उसका केस निपटने में बरसों लग जाते हैं। उसे न्यायालय ले जाने के लिए महिला पुलिस चाहिए। अकसर उनकी कमी होती है। या फिर न्यायलय में असली ' गुनाहगार' के ' क़ाबिल ' वकील 'अगली तारीख ' माँगते रहते हैं.

एक क़िस्सा बताती हूँ। आरोपी महिला, जब जेल भेजी गयी तब २ माह की गर्भवती थी। अंतमे उसकी प्रसूती का समय आ गया। उसे सरकारी अस्पताल में ले जाया गया। उसे लडकी हुई। अस्पताल के पर्चे में जब 'जनम की जगह' लिखने का वक़्त आया तो वहाँ के कारकून ने ' जेल' लिख दिया। एक समाज सेविका ने अपनी जान लड़ा दी,कि, उसे बदल अस्पताल का नाम लिखा जाय। लेकिन ऐसा नही हुआ।

हश्र क्या हुआ होगा आप सभी समझ सकते हैं। लडकी का भविष्य अंधकारमय। उसे पाठशाला भेजो तो जनम स्थान'जेल'...सबके उपहास का विषय..ऐसी लडकी का ब्याह कहाँ होगा? उसका क्या गुनाह? और १० / १२ साल जेल में सड़ने के बाद माँ निर्दोष छूट भी जाय तो समाज को क्या परवाह? वो तो ' जेल में १०/१२ साल काटी हुई औरत' , इसी तरह से जानी जायेगी...! उसे ना ससुराल वाले घर में जगह देते हैं, न मायके वाले...!

जेलों की ज़मीनी हक़ीक़त भी बताती चलूँ..जहाँ १०० महिलाओं की भी जगह नही होती वहाँ ३००/४०० महिलाएँ भी रखी जाती हैं...उन्हें सर्दियों में ओढ़ने के लिए गर घरवाले गरम वस्त्र न दें, तो जेल के पास इतने blanket नही होते...इन महिलाओं में रोजाना मार पिटाई..छीना झपटी होती है..लैंगिक अत्याचार होते हैं...कई बार आपसमे..
अंग्रेजों के ज़माने में ,महाराष्ट्र में, उन्हें ९ गज़ की साडी तथा चोली दी जाती थी...आज ६ गज़ की दी जाती है, लेकिन ' अंत:वस्त्र' नही दिए जाते...क्योंकि वह प्रथा नही...कुछ सेवा भावी संस्थाएँ ये वस्त्र डोनेशन की तौरसे जमा करती हैं.

इन सवालों से निपटने के लिए ज़रूरी हैं, कि, काफ़ी मात्र में महिला आधार गृह बने, ताकि, महिलाओं को ना किए अपराध स्वीकार ने ना पड़ें। मैंने ख़ुद अपनी ओरसे जी तोड़ कोशिश की,लेकिन सफलता हाथ नही लगी।

'पंचनामा' इस विषय पे अगली पोस्ट में लिख दूँगी।

6 टिप्‍पणियां:

Murari Pareek ने कहा…

बहुत सही कहा है, औरत की ज्यादातर पीडा पति परमेश्वर और बच्चों की जिम्मेदारी का हवाला दे कर किसी दुसरे का अपराध कबुलावाते हैं ! जरुरत है औरत को सशक्त करने की !!

SACCHAI ने कहा…

" shama , aapne fir ek baar bahut hi satik aur jabrdast sawal uthaya hai ..... "

" MAHILA ..jinko sabse jyada pida hamare samaj ki aur se mil rahi hai ye bilkul sahi hai ...magar in sabke picche kamjori ye hai ki ...." BHARTIY MAHILA AAYOG " kabhi bhi un logo ki fariyaad nahi sun raha hai...mahila aayog kyu nahi de raha un MAHILAO ka saath jo junj rahi hai ...apne adhikar ke liye ...apne per huve anyaya ke liye ...to vajah hai .........."pati ko parmeshwer manana " ...magar ye baat ek tarfai bhaari hai ..agar dekha jaye to shaadi ...jindgi ke do pahiye ke jaisi hoti hai ...jahan dono pahiye ko saman ADHIKAR RAHATA HAI ...DONO PAHIYON KO SAMAN VAJAN UTHANA PADTA HAI ....bilkul vaise hi hamari jindgi me shaadi ke baad sukh aur dukh me PATI aur PATNI ko ek saman dard aur khushi jelni padti hai ...muje ye nahi pata ki kyu samaj...aaj bhi " PATI PARMESHWER " is baat ko leker chal raha hai ? ..."

" aapki jel wali baat se bhi mai sahmat hu kyu ki ...jab tak apne rivajo me hum badlav nahi karenge ,....sayad ye aisa hi hota rahega ..."

" KHUDA kare ki BHARTIY MAHILA AAYOG jaage aur aurat ko nyay de jo junj rahi hai " pati parmeshwer " ki baat se ...."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

आज के परिवेश पर आधारित आपकी यह पोस्ट, सच्चाई भी है औरत आज भी अग्नि परीक्षा दे रही है..

ओम आर्य ने कहा…

बहुत ही अच्छी लेख प्रस्तुत करी है आपने जिसमे औरतो का समाज मे क्या अस्तित्व है,उसको आपने बहुत ही तट्स्थतासे विवरित करी है ........सच तो यही है कि मध्यम वर्ग की औरते कभी बाप के नाक को लेकर तो कभी समाज के मान को लेकर जितनी पीडा को सहती है यानी शोषण सबसे ज्यदा होता है .............

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

शमा दी, पहले तो शानदार पोस्ट के लिये बधाई. शरद जी की पोस्ट पढने के बाद सबसे पहले मेरे दिमाग में भी जो सवाल आया था वो मानसिक प्रताडना से सम्बन्धित ही था. उच्च मध्यम वर्ग में अधिसंख्य महिलायें मानसिक प्रताडना की शिकार हैं और तब भी लाचार हैं क्योंकि इसे साबित नहीं किया जा सकता. कई बार इन शिक्षित परिवारों में यदि पत्नी की आर्थिक या सामाजिक स्थिति पति से बेहतर है तब तो समझिये कि उसे हर दिन ज़लील होना ही होगा. क्योंकि अधिकांश पुरुष ये बर्दाश्त ही नहीं कर पाते कि उन्हे कोई उनकी पत्नी की वजह से जाने.

Murari Pareek ने कहा…

aap sabhi ko vijayaa dashmi ki hardik shubh kaamnae!!