शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

क्यों छूट जाते हैं अपराधी?

बहुत घिसा पिटा सवाल कर रहा हूँ । घिसा –पिटा इसलिये कि यह सवाल बार बार किया जाता है और इसका कोई जवाब नहीं आता । पहले सवाल ही कर दूं ताकि आप भी इसे पढ़ ले और इसके घिसे पिटे पन से ऊब कर यह पोस्ट छोड़कर आगे बढ़ जायें । सवाल सीधा सा है देश में रोज़ कितनी ही बहुएं जलाकर मार दी जाती हैं , प्रताड़ित की जाती हैं लेकिन अपराधी क्यों छूट जाते हैं ? हो सकता है आपके पास इसका सीधा सा जवाब भी हो “ क्या करें हमारे यहाँ के कानून में इतने पेंच हैं कि प्रभावशाली लोग इसका फायदा उठा लेते हैं । “ बस हो गया ना !! इतना ही मै सुनना चाहता था । इससे आगे कोई कुछ कहना ही नही चाहता ।कोई नहीं बताता कि हमें क्या करना चाहिये । कानून की कितनी न्यूनतम समझ होनी चाहिये ? प्रताड़ना की स्थिति में किन बातों का ध्यान रखना चाहिये ? स्त्री के हक़ में कौन कौन से नियम हैं ? आदि आदि । आप कहेंगे कि यह सब बातें लिखी हुई हैं कहीं न कहीं लेकिन उन्हे पढ़ता कौन है ? सच तो यही है कि जब तक पानी सर से ऊंचा हो जाता है कोई जान बचाने की फिक्र नहीं करता । लेकिन ऐसा कब तक होता रहेगा ?

शरद कोकास

5 टिप्‍पणियां:

shama ने कहा…

इन सब सवालोंका एकेक करके जवाब मिल जायेगा...maine इसे पोस्ट कर diya..रोज़ एकभी क्यों मरे, सवाल ये है...जवाब अलगसे दिए जायेंगे...मै ये टिप्पणी के रूपमे डाल rahee hun.

Murari Pareek ने कहा…

क्यों छुट जता है अपराधी ?? सवाल घीसा पिटा नहीं बहुत ही शक्ति शाली है, जिसका सटीक उत्तर मिल जाए तो समस्या हल हो जाए ! बहुत सारी समस्याएं हैं, गाँव में अक्सर ऐसी घटना देखने को मिली, पति ने पत्नी को जला दिया जो की बुजुर्ग हो चली थी लगभग ५५ साल के आस पास, जब वक़्त हुआ पुलिस का तो गाँव के लोगों ने अपनी समझ दिखाते हुए,एक दुर्घटना का रूप दे दिया , मरते वक़्त उस औरत ने अपने बेटे को कहा: बेटे तुन्हारे पापी बाप ने मुझे जला दिया| बेटे को गाँव वालों ने यह कह कर चुप करा दिया : जो होना था सो हो गया अब अगर पुलिस में तुम गवाही दोगे तो पूरा परिवार तबाह हो जायेगा| माँ तो गई सो गई परिवार उजड़ जाएगा |
मेरे कहने का अर्थ है की कुछ तो ऐसे समझदार लोगों के चलते अपराधी छुट जाते हैं कुछ अपनी पहुँच के चलते, कुछ घुस के चलते , और कुछ ऐसे समझदार लोगों के चलते !!

shama ने कहा…

मुरारी जी ने बड़ा सही जवाब दिया ..पुलिस के सामने गर जलाई गयी औरत मृत्युपूर्व ज़बानी ( dying declaration) देती भी है ,तो वो courtme ग्राह्य नही मानी जाती ...
औरतों को कुएमे धकेल दिया गया है ,छुरे से मारा गया है , और छुरा लेके पुलिस स्टेशन में ख़ुद कातिल पहुँचा ...लेकिन उसे 'पंचनामा ' करवानेके लिए घटना स्थलपे ले जाना पड़ता है ..उनके सामने गर वो कुबूल करे तो ठीक , वरना उसके काबिल वकील कह देन ,कि , ये बयान तो पुलिस को दिया गया था ...पुलिस के दरसे उसने ज़बरन इकबालिया बयान दिया तो , कातिल बा -इज्ज़त बरी ..!
इन्हीं 'reforms' लेके तो मै इतनी जद्दो जेहद कर रही हूँ...सन १९८१ से सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद डॉ.धरमवीर national पुलिस commission के reforms लागू हुए नही..
इसी कारण हथियार और अफीम गंजे की तस्करी करनेवाले खुले आम घुमते हैं.."पंचनामा'...तस्करी के लिए तो बियान बाँ में कहाँ से पञ्च लाये जायें? और पंचनामा करने वाला व्यक्ती इंसपेक्टर के रंक का चाहिए...कांस्टेबल नही..जबकि, गश्त के लिए कांस्टेबल जाता है...वैसे भी क़ानून की निगाहों में 'आरोपी' पे अधिक विश्वास दिखाया जाता है..पुलिस क़ानूनन गवाह नही हो सकता...
कई बार तो ख़ुद जज साहब जानते हैं, कि, गुनाह किसने किया है,लेकिन अपना 'सदसद विचार '( जिसका इस्तेमाल हर जज कर सकता है)इस्तेमाल करने से कतराते हैं...! मैंने अपनी आखों से ब्रोव्न सुगर बेचने वाली एक औरत को कई बार छूट जाते देखा है...सिर्फ़ यह कहके कि," पुलिस ने जान बूझ के मेरे कपडों में brown sugar रखी...!" बताएँ, कि, इस ५५/६० सालकी बदशक्ल औरत के जिस्म पे क्यों कोई पुलिसवाला brown sugar रखने जाएगा? लेकिन माननीय जज साहबने हमेशा उसकी बात सही मानी..पुलिस का नीती धैर्य बढेगा या घटेगा??

shama ने कहा…

एक और बात, औरत गर सत्य भी बयाँ करना चाहे तो महिला सुरक्षा समिती की कोई सदस्य हैजिर होनी चाहिए...इन समितिमेसे कई बार ज़बरन महिलाओं को पकड़ के ले जाना पड़ता है,कि, पुलिस के सामने दिया बयान कोर्ट में ग्राह्य नही...!!! महिलाएं स्वयं अपनी पडोसन को बचने नही जातीं...येभी सच है..
अपना नागरिक होनाका कर्तव्य कितने लोग निभाते हैं? रास्तेपे अपघात में कोई मर रहा होता है, लोग दर्शक बन जाते हैं...कोई फिट आके सड़क के बीछो बीछ गिर पड़ता है, और लोग आस पास से निकल जाते हैं..

SACCHAI ने कहा…

" bahut hi sahi sawal hai shamaji aapka , mai aap se sahemat hu "

----- eksacchai { AAWAZ }

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