सोमवार, 21 सितंबर 2009

धुंध

धुंध का वातावरण है इन दिनों,
खौफ में सारा जहाँ है इन दिनों।
ढूँढने से भी अब नहीं मिलता इंसा,
जानवर की खाल में सब इन दिनों।
रात सपने में सच आया,
झूठ से वह डर गया है इन दिनों।
जा रहे थे हम तो सीधे ही मगर,
ख़ुद को चौरस्ते पे पाया इन दिनों।
कर रहे थे बरसों से हिफाज़त जिनकी हम,
दुश्मनों की भीड़ में उनको भी पाया इन दिनों।
कितनी बातें, कितनी यादें, जेहन में दफना दीं हैं,
अब तो उनकी लाश बची है, इन दिनों।
आज ज़रा जब गौर से देखा ख़ुद का चेहरा,
शक्ल अनजानी लगी है इन दिनों।

11 टिप्‍पणियां:

shama ने कहा…

वंदनाजी अपनी एक रचना याद आ गयी ..शीर्षक था ," झूट का डेरा "!

पेश करती हूँ ,आपके लिए ..!

" अंधियारे भयंकर तूफ़ान में ,
अंजाने पहुँचे , एक पनाहमे ,
देखा ,जब होश आए
हम खड़े थे
झूठ के डेरेमे ,
उस भयानक तूफानमे ..

राज़ कितने उजागर हुए ,
सचका जमा पहने
कई चेहरे नज़र आए ,
चुराने लगे हमसे आँखें ,
मुँह फेर बन अनजाने ,
उस भयानक तूफाँ में... "

लेकिन येभी जन, की, हर उग में सत्य असत्य, सुंदर विद्रूप साथ, साथ अवतरित हुए...बात सिर्फ़ आजकल की नही..इतिहास गवाह है..सदियों से ये सिलसिला चल रहा है..हमें क्या चाहिए इसका चयन हमें ही करना है..और सच बड़ी कीमत माँगता है...!

ओम आर्य ने कहा…

दर्द की दास्तान को बयाँ करती रचना .......काल का अंतराल भी ऐसा ही कुछ लिये होता हर एक के जीवन मे .......जो पुर्ण समप्रेषनिय रचना ......जो मेरा बीता हुआ कल है ......बहुत सुन्दर .....और क्या कहे!

Arvind Mishra ने कहा…

वाह ? आपकी ही हैं न ? वो क्या है की इन दिनों कविताओं पर जरा टिप्पणियाँ करने में कलेजा मुंह को आता है !

SACCHAI ने कहा…

" wah ! dard se bhari dastan hai ye ...bahut hi acchi abhivyakti ...abhar aapka "

" magar yahan aawaz uthana hai ...kavita ki jaroorat nahi hai ..ye aapko pata hona chahiye ..."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

०-धन्यवाद शमा दी.
०-धन्यवाद ओम जी.
०-अरविन्द जी, डरने की ज़रूरत नहीं है, रचना सौ फ़ीसदी मेरी ही है.
०-धन्यवाद....भविष्य में खयाल रखूंगी.

Mithilesh dubey ने कहा…

वाह-वाह क्या बात है, लाजवाब रचना। आपकी हर एक पंक्ति दिल तक उतर रहीं हैं। आपके शब्दो का चयन बहुत ही बेहतरिन है। इस लाजवाब रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई...

Udan Tashtari ने कहा…

आज ज़रा जब गौर से देखा ख़ुद का चेहरा,
शक्ल अनजानी लगी है इन दिनों।


-बेहद लाजबाब रचना.बहुत खूब भाव!!

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

वंदना जी
आप की अभिव्यक्ति सत्यता के बहुत करीब है , सच शमा जी का उठाया बीड़ा निश्चित रूप से चेतना जागृत करेगा, फिर आप जैसे साहित्यकारों का लेखन भी हमारे साथ है.
बधाई.
- विजय तिवारी ' किसलय

ज्योति सिंह ने कहा…

ek saath do rachna ,ek ke saath ek free ,blog par aur tippani par bhi ,magar dono shaandar ,shama ji ki bhi rachna utni hi behtrin jitni vandana ji ki .

ज्योति सिंह ने कहा…

ek saath do rachna ,ek ke saath ek free ,blog par aur tippani par bhi ,magar dono shaandar ,shama ji ki bhi rachna utni hi behtrin jitni vandana ji ki .

संजय भास्कर ने कहा…

वाह-वाह क्या बात है, लाजवाब रचना। आपके शब्दो का चयन बहुत ही बेहतरिन है। इस लाजवाब रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई