सोमवार, 14 सितंबर 2009

आतंकवाद अपना विध्वंशक रूप क्यों अख्तियार करता जा रहा है ?

एक सवाल तुम करो" में आज मैं आतंकवाद पर अपने दोहों के माध्यम से सवाल उठना चाहता हूँ. हमारे देश और विश्व के अनेक देशों में जिस तरह आतंकवाद अपना विध्वंशक रूप अख्तियार करता जा रहा है इसे देखते हुए हर अमन पसंद इंसान को हार्दिक पीड़ा होना स्वाभाविक है. ये लोग चन्द सिक्कों और स्वार्थ के लिए जिस तरह सरकारी सम्पत्ती का विनाश और निरपराधों की हत्या करते हैं, इसकी मुख्य वजहें क्या हैं, इन पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता है.

1. आतंकवादी अलगाव क्यों चाहते हैं ?
2. आख़िर हम- आप जिस समाज में रहते है इसी समाज से ही तो आतंकवादी बंनते हैं, आख़िर क्यों ?
3. इन्हें विकास , प्रगति और भाईचारा किन क़ारणों और किन परिस्थितियों से गवारा नहीं है ?
4. हम इनका खुल कर विरोध क्यों नहीं करते हैं .
ऐसे ही अनेक अनुत्तरित सवाल हैं जिन पर हमें चिंतन की शख्त ज़रूरत है.
मैने ऐसे ही कुछ सवाल अपने दोहों में उठाए हैं , जिन्हे मैं आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

विश्व शांति के दौर में, आतंकी विस्फोट
मानव मन में आई क्यों, घृणा भरी यह खोट

विकृत सोच से मर रहे, कितने नित निर्दोष
सोचो अब क्या चाहिए, मातम या जयघोष

प्रश्रय जब पाते नहीं, दुष्ट और दुष्कर्म
बढ़ती सन्मति,शांति तब, बढ़ता नहीं अधर्म

दुष्ट क्लेश देते रहे, बदल ढंग और भेष
युद्ध अदद चारा नहीं, लाने शांति अशेष

मानवीय संवेदना, परहित, जन-कल्याण
बंधुभाव और प्रेम ने, जग से किया प्रयाण

मानवता पर घात कर, जिन्हें ना होता क्षोभ
स्वार्थ-शीर्ष की चाह में, बढ़ता उनका लोभ

हर आतंकी खोजता, सदा सुरक्षित ओट
करता रहता बेहिचक, मौका पाकर चोट

पाते जो पाखंड से,भौतिक सुख सम्मान
पोल खोलता वक्त जब, होता है अपमान

रक्त-पिपासू बने जो, आतंकी अतिक्रूर
सबक सिखाता है समय, भूल गये मगरूर

सच पैरों से कुचलता, सिर चढ़ बोले झूठ
इसीलिए अब जगत से, मानवता गई रूठ

निज बल बुद्धि विवेक पर, होता जिन्हें गुरूर
उनके ' पर ' कटते सदा, है सच का दस्तूर

आतंकी हरकतों से, दहल गया संसार
अमन-चैन के लिए अब, हों सब एकाकार

बरपे आतंकी कहर, बिगड़े जग-हालात
अब होना ही चाहिए, अमन-चैन की बात

गहरी जड़ आतंक की, उनके निष्ठुर गात
दें वैचारिक युद्ध से, उन्हें करारी मात

मानव लुट-पिट मर रहा, आतंकी के हाथ
माँगे से मिलता नहीं, मददगार का साथ

मानवता जब सह रही, आतंकी आघात
गाँधीवादी क्रांति से, लाएँ शांति प्रभात

आतंकी सैलाब में, मानवता की नाव
कहर दुखों का झेलती, पाए तन-मन घाव

कोई ना होता जन्म से, अगुणी या गुणवान
संस्कार ही ढालते, देव, दनुज, इंसान

अपराधों की शृंखला, झगड़े और बवाल
शांति जगत की छीनने, है आतंकी चाल

"किसलय" जग में श्रेष्ठ है, मानवता का धर्म
अहम त्याग कर जानिए, इसका व्यापक मर्म

- डॉ. विजय तिवारी " किसलय "
जबलपुर ( म.प्र.)

9 टिप्‍पणियां:

shama ने कहा…

Bshut pahle,"jagrutee" film me Pradeep kee rachana thee,
" baarood ik dherpe baithee hai ye duniya,
atom bamon ke zorpe ainthee hai ye duniya...
tum uthana har qadam zara dekh bhalke....
mere bachho is deshko rakhna sambhalke..."
Aaj na pathshalaon me ye siksha miltee hai,na pariwaron me..afsos...kewal pareeksha me gun kitne mile isee baat pe nazar rahtee hai...achha Bharatwaasee/achha insan bannepe nahee...

shama ने कहा…

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Blogger shama said...

बहुत पहले ,"जागृती " फ़िल्म में प्रदीप की रचना थी ,
" बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनिया ,
ऎटम बमों के ज़ोरपे ऐंठी है ये दुनिया ...
तुम उठाना हर क़दम ज़रा देख भालके ....
mere bachho is deshko rakhna sambhalke..
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Blogger shama said...

बरसों पहले ,"जागृती " फ़िल्म में प्रदीप की रचना थी ,
" बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनिया ,
ऎटम बमों के ज़ोरपे ऐंठी है ये दुनिया ...
तुम उठाना हर क़दम ज़रा देख भालके ....
इस देशको रखना सम्भालके ..."
आज न पाठशालाओं में ये शिक्षा मिलती है ,न परिवारों में ..अफ़सोस ...केवल परीक्षा में गुण कितने मिले इसी बात पे नज़र रहती है ...अच्छा भारतवासी /अच्छा इन्सान बननेपे नही ...

पढ़ें:
http://lalitlekh.blogspot.com
http://shamasansmaram.blogspot.com

आलेख: " प्यारकी राह दिखा दुनिया को", कहाँ हैं, जिन्हें नाज़ है, हिंद पे वो कहाँ हैं?"," मेरी आवाज़ सुनो"," एक हिन्दुस्तानी की ललकार फिर एकबार"( काव्य रचना)

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर मुद्दे को उठाया है आपने .. आज विश्‍व बंधुत्‍व की भावना का समाप्‍त होना ही मुख्‍य कारण है .. गलत संस्‍कारवालों के द्वारा आतंकवाद के पनपने का भी .. और सही संस्‍कारवालों के इसका विरोध न कर पाने का भी !!

Udan Tashtari ने कहा…

इस विषय पर बहुत सारगर्भित दोहे. आनन्द आ गया.

यह दोहे के माध्यम से एक क्रांति का आगाज है. अनन्त शुभकामनाएँ.

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.

जय हिन्दी!

अर्शिया ने कहा…

बहुत गम्भीर सवाल उठाए हैं आपने।
{ Treasurer-S, T }

SACCHAI ने कहा…

" bahut bahut aabhar aapka ...sahi aur sarthak mudda aapne samne rakha hai ...dhanyawad "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मानव लुट-पिट मर रहा, आतंकी के हाथ
माँगे से मिलता नहीं, मददगार का साथ
बहुत उम्दा और सचेत करते दोहे.बधाई.

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

बहुत ही सच और ह्रदय विदारक द्रश्य उपस्थित कर दिया आपने अपने इन दोहों के माध्यम से.
शायद यह ही किसी क्रांति को जन्म दे सके. इस सुप्त देश में ...............
हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

ज्योति सिंह ने कहा…

shama ji aapki itni itni saari taarife suni apne dost se ki aapke blog ko dekhne ka man ho pada .aapki tabiyat ki bhi khabar lagi,aap itni nek dil hai ki khuda aapki hifajat ke liye sada saath hai .hum bhi dua karte hai aap jaldi pahale ki tarah swasth ho jaaye .sabhi rachana yahan behtrin hai .