मंगलवार, 29 सितंबर 2009

"क्या हैं भावना"

मन में एक सवाल तब उठा जब मेरे रूम पार्टनर ने मुझसे कहा "क्या हैं भावना" भावना कुछ नहीं होती हैं | जब हमें अपना उदेश्य साधना होता है तो हम सारी भावनाओं को दरकिनार कर देते हैं |
मैं सोचने पर मजबूर हो गया की ये सख्स जो मुझसे कह रहा है भावना क्या है भावना कुछ नहीं होती, अगर ऐसा होता की मनुष्य के दिल में भावना न होती तो कितना अनर्थ हो जाता | अपने स्वार्थ के लिए फिर मनुष्य कुछ भी कर सकता था | मनुष्य पत्थर्वत होता | अब मुझे लगता है की जो लालच के बस आते हैं उनकी भावना मर जाती है या मार देते हैं तभी दहेज़ उत्पीडन जैसी वारदातें होती हैं | जब दिल में भावना ही नहीं हैं तो बेबस लाचार की दुहाई और कराह की क्या बिसात ? लोगों को बेमौत मार देना, कई वारदातें ऐसी होती हैं की दिल दहल जाता है बहुत ही वहसीयाने तरीके से, तो क्या जो ऐसे कु-कृत्यों को अंजाम देते हैं उनमे भावना होती है ? क्या आपको नहीं लगता की भावना की कमी के कारण ही बेबस और लाचारों की दुदशा होती है ??

सवाल जो सबका हो सकता है (अविनाश वाचस्‍पति)

विचार क्‍यों आते हैं और हम उन्‍हें क्‍यों लिखते हैं ।

रविवार, 27 सितंबर 2009

कुछ सवालों के जवाब...

शरद जी ने कुछ सवाल किए थे...अपनी इस पोस्ट के ज़रिये उनके कुछ जवाब दे रही हूँ:

१) मानसिक प्रताड़ना: हाँ..ये सबसे भयंकर प्रताड़ना है, जिसके सुबूत जुटाना बड़ा मुश्किल काम है। शारीरिक प्रताड़ना के जुटाए भी जा सकते हैं.
इस प्रताड़ना को मध्यम वर्गों में सबसे अधिक पाया जाता है। निम्न वर्ग में शारीरिक प्रताड़ना दिख आती है। उच् वर्ग में सही नही जाती...गर स्त्री के पास उपाय हो या मायके से मिली जायदाद हो तो वह अपने घरसे निकल सकती है, ब-शर्ते के, मायके वाले उसपे लौट जाने की ज़बरदस्ती न करें( जैसे कि, मैंने, 'अर्थी तो उठी...' इस आलेख में लिखा था। )
निम्न वर्ग के प्रताड़ना के प्रती प्रतिक्रियाका एक उदहारण देती हूँ। मेरी किसी रिश्ते के बहन के घर , उसकी प्रसूती के बाद, मालिश करने एक औरत आती थी। एक दिन बहन ने उसे पूछा :
" तुम्हारे परिवार में कौन लोग हैं? "
औरत: " मेरी ५ बेटियाँ हैं। २ की शादी हो गयी हेई। ३ पढ़ रही हैं।"
बहन :" और पती? वो क्या करते हैं?"
औरत : " वो तो मर गया"।
बहन : " अरे अरे...!"
औरत : " ये अरे, अरे कायको बोलती ? अच्छा हुआ मर गया। मै कमाती थी..वो शराब पीता और मुझे पीटता...वैसे मै भी, चूल्हे से लकडी निकल मार देती...मर गया पी, पी के..उसके बाद तो मै एकदम मजे से रहती...लडकी लोग का शादी बनाया...जेवर बनाया...३ लडकी पढता...देखो, तुमसे मै १००० रुपये महिना लेती...और ५ जगा काम करती...सब जन मेरेको तीज त्यौहार पे टिप देता..उसमे से गहना बनाती..."

यह बात २५ साल पूर्व की है...५००० रुपये माह कमाना मायने रखता...इतना तो एक मध्यम वर्गीय नौकरी पेशा महिला भी उन दिनों नही कमा सकती थी...! ना तो इस तरह का उत्तर दे सकती थी....

२) मध्यम वर्गीय महिलाएँ जाय तो कहाँ जाय ? इसलिए पुलिस महकमें में महिला सलाह गार समिती होती है, जो इसतरह के पारिवारिक अत्याचार या प्रताड़ना से निपटने की कोशिश करती है।
आधार गृहों की कमी है। महिलाएँ अपने साथ बच्चे नही रख सकतीं...येभी एक कारण है,कि, औरत प्रताड़ना सह जाती है।
गर लड़का हो तो वो ५ साल का होने के बाद बाल सुधार गृह में भेज दिया जाता है। वहाँ उसपे क्या संस्कार होते होंगे,ये सब समझ सकते हैं...बच्चे वहाँसे भाग ने की कोशिश में रहते हैं। गुनेहगार बन जाते हैं।

३) मध्यम वर्गीय महिला पे अडोस पड़ोस वाले या घरवाले ही दबाव डालते हैं, कि, वो'अपघातन जल गयी...' यही जवाब दे..वरना उसके बच्चे भी अनाथ हो जायेंगे...

४) कई बार घरमे ही किसी की हत्या पती करता है, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारी पत्नी को लेनी पड़ती है...' पती तो परमेश्वर होता है...तू उसके ख़िलाफ़ कैसे बोल सकती है? नरक मिलेगा नरक'...या फिर तेरे बाल बच्चों की देखभाल कौन करेगा ?' यह कहके उसे चुप कराया जाता है।

५) गर किसी महिला को किसी ना किए अपराध के लिए कारावास में डाल दिया हो तो, उसका केस निपटने में बरसों लग जाते हैं। उसे न्यायालय ले जाने के लिए महिला पुलिस चाहिए। अकसर उनकी कमी होती है। या फिर न्यायलय में असली ' गुनाहगार' के ' क़ाबिल ' वकील 'अगली तारीख ' माँगते रहते हैं.

एक क़िस्सा बताती हूँ। आरोपी महिला, जब जेल भेजी गयी तब २ माह की गर्भवती थी। अंतमे उसकी प्रसूती का समय आ गया। उसे सरकारी अस्पताल में ले जाया गया। उसे लडकी हुई। अस्पताल के पर्चे में जब 'जनम की जगह' लिखने का वक़्त आया तो वहाँ के कारकून ने ' जेल' लिख दिया। एक समाज सेविका ने अपनी जान लड़ा दी,कि, उसे बदल अस्पताल का नाम लिखा जाय। लेकिन ऐसा नही हुआ।

हश्र क्या हुआ होगा आप सभी समझ सकते हैं। लडकी का भविष्य अंधकारमय। उसे पाठशाला भेजो तो जनम स्थान'जेल'...सबके उपहास का विषय..ऐसी लडकी का ब्याह कहाँ होगा? उसका क्या गुनाह? और १० / १२ साल जेल में सड़ने के बाद माँ निर्दोष छूट भी जाय तो समाज को क्या परवाह? वो तो ' जेल में १०/१२ साल काटी हुई औरत' , इसी तरह से जानी जायेगी...! उसे ना ससुराल वाले घर में जगह देते हैं, न मायके वाले...!

जेलों की ज़मीनी हक़ीक़त भी बताती चलूँ..जहाँ १०० महिलाओं की भी जगह नही होती वहाँ ३००/४०० महिलाएँ भी रखी जाती हैं...उन्हें सर्दियों में ओढ़ने के लिए गर घरवाले गरम वस्त्र न दें, तो जेल के पास इतने blanket नही होते...इन महिलाओं में रोजाना मार पिटाई..छीना झपटी होती है..लैंगिक अत्याचार होते हैं...कई बार आपसमे..
अंग्रेजों के ज़माने में ,महाराष्ट्र में, उन्हें ९ गज़ की साडी तथा चोली दी जाती थी...आज ६ गज़ की दी जाती है, लेकिन ' अंत:वस्त्र' नही दिए जाते...क्योंकि वह प्रथा नही...कुछ सेवा भावी संस्थाएँ ये वस्त्र डोनेशन की तौरसे जमा करती हैं.

इन सवालों से निपटने के लिए ज़रूरी हैं, कि, काफ़ी मात्र में महिला आधार गृह बने, ताकि, महिलाओं को ना किए अपराध स्वीकार ने ना पड़ें। मैंने ख़ुद अपनी ओरसे जी तोड़ कोशिश की,लेकिन सफलता हाथ नही लगी।

'पंचनामा' इस विषय पे अगली पोस्ट में लिख दूँगी।

शनिवार, 26 सितंबर 2009

इंसान क्या इंसान जैसा है ??

सवाल सचमुच बहुत है, कुछ कानूनी कुछ इंसानी, खैर कानून की बात करें तो भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हर कोई फस चुका है | बात करते हैं इंसानी सवालों की, जो हमारे बस में है, जो हम कर सकते हैं|
मानव इस प्रकृति की सबसे सुन्दर रचना है, जो प्रेम सोहार्द ,भावाना सब कुछ समझता है, और सबसे बलवान है| बलवान को निर्बल से हमेशा प्यार भरा व्यवहार करना चाहिए ये भावनात्मक विवेक कहता है ,पर क्या निरीह और बेजुबान प्राणियों के साथ इंसान प्यार से पेश आता है ?? जैसे चाहता है वैसे किसी भी जानवर को मारता है | "बीफ" बनाने के ऐसे ऐसे तरीके हैं की दिल दहल जाता है, गाय के छोटे बछडे को जो की २-३ महीने का होता है उसे भूसे का पानी खिला खिला के जिंदा रखा जाता है, यानी उसे तिल तिल करके मारा जाता है, ताकि उसका कलेजा किसमिस की तरह हो जाय | फिर उसके कलेजे को महंगे भाव में बेचा जाता है | हम बात करते हैं सिर्फ अपनी " इंसानों" की पर इंसान क्या इंसान जैसा है ??

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

आपके मन में भी यह सवाल तो आये होंगे ?


शमा जी ने मेरे मन में उपजे सवालों को पहले ही पोस्ट कर दिया है ,लेकिन यह मन बहुत अजीब है या तो सवाल आते नहीं हैं और आते हैं तो फिर नीन्दें ही उड़ जाती है । मेरी भी नींद उड़ गई है और दिमाग में कोई कविता नहीं सिर्फ सवाल  । मैने  सवाल किया था देश में रोज़ कितनी ही बहुएं जलाकर मार दी जाती हैं , प्रताड़ित की जाती हैं लेकिन  अपराधी क्यों छूट जाते हैं ? आपके पास इसका सीधा सा जवाब भी हो “ क्या करें हमारे यहाँ के कानून में इतने पेंच हैं कि प्रभावशाली लोग इसका फायदा उठा लेते हैं । “कुछ और सवाल मेरे मन मे आये तो सोचा उन्हे भी लिख ही दूँ ।चलिये पिछले सवालों में जोड़कर लिख देता हूँ  । सवाल है कि हर व्यक्ति को कानून की कितनी न्यूनतम समझ होनी चाहिये ? प्रताड़ना की स्थिति में किन बातों का ध्यान रखना चाहिये ? स्त्री के हक़ में कौन कौन से नियम हैं ? विवाह के पश्चात कितने साल के भीतर स्त्री कानून का सहारा ले सकती है? प्रताड़ित स्त्री के पास कौन कौन से सबूत होने चाहिये ? गवाह कैसे जुटाना चाहिये ? एक और बात कानून में एक शब्द आता है " पंचनामा " वह क्या होता है ? क्या इसके लिये पाँच गवाह होना ज़रूरी है? आजकल तो एक व्यक्ति भी मुश्किल से मिलता है पास पड़ोस में । यदि कोई गवाही देने वाला न मिले तो ? कई जगह देखा गया है कि प्रताड़ित स्त्री पर ज़ोर डालकर लिखवा लिया गया कि वह सुखी है ,उसके साथ मार-पीट नहीं हुई है ,आदि आदि ।यह भी कई बार होता है कि मेडिकल जाँच में  शारीरिक प्रताड़ना के कोई सबूत नहीं मिलते ? यह जाँच किस तरह की जाती है? इसे कौन करता है ? यह कैसे प्रभावित हो सकती है ? और क्या मानसिक प्रताड़्ना भी कानून के दायरे मे आती है ? उसे कैसे अपने हक़ में सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है ?  ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जो आपके भी मन में उठते होंगे । 
चलिये हम सब मिल कर इनके उत्तर ढूँढने की कोशिश करते हैं ।

-शरद कोकास 

क्यों छूट जाते हैं अपराधी?

बहुत घिसा पिटा सवाल कर रहा हूँ । घिसा –पिटा इसलिये कि यह सवाल बार बार किया जाता है और इसका कोई जवाब नहीं आता । पहले सवाल ही कर दूं ताकि आप भी इसे पढ़ ले और इसके घिसे पिटे पन से ऊब कर यह पोस्ट छोड़कर आगे बढ़ जायें । सवाल सीधा सा है देश में रोज़ कितनी ही बहुएं जलाकर मार दी जाती हैं , प्रताड़ित की जाती हैं लेकिन अपराधी क्यों छूट जाते हैं ? हो सकता है आपके पास इसका सीधा सा जवाब भी हो “ क्या करें हमारे यहाँ के कानून में इतने पेंच हैं कि प्रभावशाली लोग इसका फायदा उठा लेते हैं । “ बस हो गया ना !! इतना ही मै सुनना चाहता था । इससे आगे कोई कुछ कहना ही नही चाहता ।कोई नहीं बताता कि हमें क्या करना चाहिये । कानून की कितनी न्यूनतम समझ होनी चाहिये ? प्रताड़ना की स्थिति में किन बातों का ध्यान रखना चाहिये ? स्त्री के हक़ में कौन कौन से नियम हैं ? आदि आदि । आप कहेंगे कि यह सब बातें लिखी हुई हैं कहीं न कहीं लेकिन उन्हे पढ़ता कौन है ? सच तो यही है कि जब तक पानी सर से ऊंचा हो जाता है कोई जान बचाने की फिक्र नहीं करता । लेकिन ऐसा कब तक होता रहेगा ?

शरद कोकास

सोमवार, 21 सितंबर 2009

धुंध

धुंध का वातावरण है इन दिनों,
खौफ में सारा जहाँ है इन दिनों।
ढूँढने से भी अब नहीं मिलता इंसा,
जानवर की खाल में सब इन दिनों।
रात सपने में सच आया,
झूठ से वह डर गया है इन दिनों।
जा रहे थे हम तो सीधे ही मगर,
ख़ुद को चौरस्ते पे पाया इन दिनों।
कर रहे थे बरसों से हिफाज़त जिनकी हम,
दुश्मनों की भीड़ में उनको भी पाया इन दिनों।
कितनी बातें, कितनी यादें, जेहन में दफना दीं हैं,
अब तो उनकी लाश बची है, इन दिनों।
आज ज़रा जब गौर से देखा ख़ुद का चेहरा,
शक्ल अनजानी लगी है इन दिनों।

सोमवार, 14 सितंबर 2009

आतंकवाद अपना विध्वंशक रूप क्यों अख्तियार करता जा रहा है ?

एक सवाल तुम करो" में आज मैं आतंकवाद पर अपने दोहों के माध्यम से सवाल उठना चाहता हूँ. हमारे देश और विश्व के अनेक देशों में जिस तरह आतंकवाद अपना विध्वंशक रूप अख्तियार करता जा रहा है इसे देखते हुए हर अमन पसंद इंसान को हार्दिक पीड़ा होना स्वाभाविक है. ये लोग चन्द सिक्कों और स्वार्थ के लिए जिस तरह सरकारी सम्पत्ती का विनाश और निरपराधों की हत्या करते हैं, इसकी मुख्य वजहें क्या हैं, इन पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता है.

1. आतंकवादी अलगाव क्यों चाहते हैं ?
2. आख़िर हम- आप जिस समाज में रहते है इसी समाज से ही तो आतंकवादी बंनते हैं, आख़िर क्यों ?
3. इन्हें विकास , प्रगति और भाईचारा किन क़ारणों और किन परिस्थितियों से गवारा नहीं है ?
4. हम इनका खुल कर विरोध क्यों नहीं करते हैं .
ऐसे ही अनेक अनुत्तरित सवाल हैं जिन पर हमें चिंतन की शख्त ज़रूरत है.
मैने ऐसे ही कुछ सवाल अपने दोहों में उठाए हैं , जिन्हे मैं आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

विश्व शांति के दौर में, आतंकी विस्फोट
मानव मन में आई क्यों, घृणा भरी यह खोट

विकृत सोच से मर रहे, कितने नित निर्दोष
सोचो अब क्या चाहिए, मातम या जयघोष

प्रश्रय जब पाते नहीं, दुष्ट और दुष्कर्म
बढ़ती सन्मति,शांति तब, बढ़ता नहीं अधर्म

दुष्ट क्लेश देते रहे, बदल ढंग और भेष
युद्ध अदद चारा नहीं, लाने शांति अशेष

मानवीय संवेदना, परहित, जन-कल्याण
बंधुभाव और प्रेम ने, जग से किया प्रयाण

मानवता पर घात कर, जिन्हें ना होता क्षोभ
स्वार्थ-शीर्ष की चाह में, बढ़ता उनका लोभ

हर आतंकी खोजता, सदा सुरक्षित ओट
करता रहता बेहिचक, मौका पाकर चोट

पाते जो पाखंड से,भौतिक सुख सम्मान
पोल खोलता वक्त जब, होता है अपमान

रक्त-पिपासू बने जो, आतंकी अतिक्रूर
सबक सिखाता है समय, भूल गये मगरूर

सच पैरों से कुचलता, सिर चढ़ बोले झूठ
इसीलिए अब जगत से, मानवता गई रूठ

निज बल बुद्धि विवेक पर, होता जिन्हें गुरूर
उनके ' पर ' कटते सदा, है सच का दस्तूर

आतंकी हरकतों से, दहल गया संसार
अमन-चैन के लिए अब, हों सब एकाकार

बरपे आतंकी कहर, बिगड़े जग-हालात
अब होना ही चाहिए, अमन-चैन की बात

गहरी जड़ आतंक की, उनके निष्ठुर गात
दें वैचारिक युद्ध से, उन्हें करारी मात

मानव लुट-पिट मर रहा, आतंकी के हाथ
माँगे से मिलता नहीं, मददगार का साथ

मानवता जब सह रही, आतंकी आघात
गाँधीवादी क्रांति से, लाएँ शांति प्रभात

आतंकी सैलाब में, मानवता की नाव
कहर दुखों का झेलती, पाए तन-मन घाव

कोई ना होता जन्म से, अगुणी या गुणवान
संस्कार ही ढालते, देव, दनुज, इंसान

अपराधों की शृंखला, झगड़े और बवाल
शांति जगत की छीनने, है आतंकी चाल

"किसलय" जग में श्रेष्ठ है, मानवता का धर्म
अहम त्याग कर जानिए, इसका व्यापक मर्म

- डॉ. विजय तिवारी " किसलय "
जबलपुर ( म.प्र.)

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

कानून और उसके बेबस रखवाले...

शमाजी के पोस्ट को पढ़ रहा था...कानून को लेकर उन्होंने एक अच्छी चर्चा शुरू करने की चेष्टा की है...साथ ही पूर्व उप-राष्ट्रपति के उद्गारों का उल्लेख भी उन्होंने किया है... इस मुद्दे पर उनकी चिंता जायज़ है और इस लेख से पता चलता है कि हमारे राष्ट्र के उच्चतम शिखर पर बैठे महानुभाव जमीनी हकीकत से अन्भिज्ञं नहीं हैं...

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि देश में हर क्षेत्र में सुधार की अव्यश्यकता है और यह सम्भव भी है...जरुरत है कि हम नागरिक इन समस्यायों से परिचित हों और कोशिश करें कि इसमें सुधार के लिए जो भी सम्भव हो करें...

जहाँ तक जानकारी कि बात है... अधिकतर लोग इन जटिल समस्याओं से अवगत हैं...

कुछ बातें हैं जिनपर मैं आपलोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा...

भारत एक बड़ी जनसँख्या और जटिल व्यवस्था वाला देश है... तो यहाँ अपराध भी अनेक प्रकार के होते है लेकिन उनको रोकने का पर्याप्त साधन नहीं है और इच्छाशक्ति कि कमी भी है...

मैंने पढ़ा है कि भारत में १००० व्यक्ति पर १ से भी कम पुलिश वाले हैं... और कल ही एक न्यायमूर्ति के बयां से जाना कि यहाँ १०००,००० लोगो पर केवल १०.५ जज हैं...

इस स्थिति में अपराध को कम करना या मुकदमों का जल्दी निबटारा करना बहुत ही मुश्किल कार्य है इसके अलावा ऐसे कानून हैं कि कानून के रखवालों के हाथ भी बंधें होते हैं... करेला पर नीम चढा वाली हालत तब हो है जब नेता और समाज के प्रतिष्ठित लोग न्यायिक प्रक्रिया में दखल देने लगते है...
इधर पुलिस रेमोर्म का कुछ प्रयास हो रहा है...