गुरुवार, 20 अगस्त 2009

घिरे हैं हम सवाल से हमे जवाब चाहिये

शमा जी ने कहा "एक सवाल तुम करो " और मुझे बहुत पुराना वो गीत याद आ गया " एक सवाल तुम करो ,एक सवाल मैं करूँ ,हर सवाल का जवाब ही सवाल है.."इस गीत को अगर आप ध्यान से सुने तो सचमुच ऐसा ही है ,सवाल का जवाब खत्म होते होते वह फिर सवाल बन जाता है ।क्या हम लोगों के जीवन में भी ऐसा ही नही घटित होता? शलभ जी की प्रसिद्ध कविता है " घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिये ,जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिये.." रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम जने कितने ही सवालो से घिरे हैं । रोज़ी-रोटी का सवाल,बच्चों की शिक्षा का सवाल, अच्छे स्वास्थ्य का सवाल,रहने के लिये एक ठिकाने का सवाल . और जो इन सवालों के जवाब दे सकते हैं वे कहते हैं कि सवाल मत करो ..तुम्हे सवाल करने का कोई हक़ ही नही है . हम कहते है कि नहीं इनकी ज़रूरत है तो वे निहायत ग़ैरज़रूरी चीज़ों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर कह्ते है .. ये ज़रूरी है इन्हे देखो . कि आपके घर टी.वी. में कितने चैनल आते हैं,आपके बच्चे को नूडल्स पिज़्ज़ा वगैरह मिलता है या नहीं,आपके पास महंगा वाला मोबाईल है या नहीं । हो सकता है आप को यह सही लगता हो लेकिन इस बात की तह में जाईये आपको इसका अर्थ समझ मे आ जायेगा । चलिये आप इस बात पर सोचिये और सोचते हुए मेरी यह कविता पढ़िये ..भाषण से बेहतर कविता होती है.- शरद कोकास

ज़रूरत

क्या ज़रूरी है
दिया जाए कोई बयान
ज़रूरतों के बारे में
पेश की जाए कोई फेहरिस्त
हलफनामा दिया जाए

चिड़िया से पूछा जाए
क्यों ज़रूरी है अनाज का दाना
चूल्हे से तलब की जाए आग की ज़रूरत
पशुओं से मांगा जाए घास का हिसाब
कपड़ों से कपास का
छप्पर से बाँस का हिसाब मांगा जाए
हल्दी से पूछी जाए
हाथ पीले होने की उमर
दवा की शीशी से पूछा जाए
दवा का असर
फूलों से रंगत की
बच्चों से हँसी की ज़रूरत पूछी जाए
क्या ज़रूरी है
हर ज़रूरी चीज़ के बारे में
किया जाए कोई सवाल ।

- शरद कोकास
(चित्र गूगल से साभार)

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत अच्छा लगा पढ़कर.

आज ही दस दिनों की टेक्सस यात्रा से लौटा. अब सक्रिय होने का प्रयास है.

अब लगातार पढ़ना है, नियमित लिखें..

सादर शुभकामनाऐं.

shama ने कहा…

धन्यवाद शरदजी !
फिलहाल तो मै 'अर्थी तो उठी ' इस सत्य कथा को पूरा कर लेती हूँ ..! शायद तबतक आपके लिखे पे कोई अन्य comment आ जाए ! वरना ,हमें , चंद सवालों के जवाब , संजीदगी के साथ , अंतर्मुख हो के खोजने तो होंगे !
जैसेकि , आतंकवाद ..हम क्या कर सकते हैं ? हमारी कहाँ गलती हो रही है ?हमारा,अपने समाज या देश के प्रती,क्या कर्तव्य बनता है..एक जुट होके या अपने,अपने तरीकेसे, हम कहाँ, कहाँ और किस तरह से,सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं..इस विचार मंच का/प्रश्न मंच का उद्देश तो यही है..!

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

रचना बहुत ही सार्थक है
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मानव मस्तिष्क पढ़ना संभव

shama ने कहा…

शरदजी ,
क्षमा प्राथी हूँ ...अपने आलेख चाहती हूँ कि ,एकही दिनमे प्रकाशित न हों ...'आईये हाथ उठायें ,हमभी "...ये सुझावों के लिए अलग मंच , जो इसीका हिस्सा होगा , बनाना चाह रही हूँ ..

नया सिलसिला है...आपको कमसे कम तकलीफ देना चाहती हूँ..मक़सद सिर्फ़ एक है, जनजागृती...लोक तंत्र में लोग हाथ पे हाथ धरे बैठे न रहें...बस...

please bear with me..!