गुरुवार, 13 अगस्त 2009

आईये हाथ उठायें हम..मिलके..!

नीरज जी,
आपने तो मुझे एक आव्हान ही दे दिया! अब कैसे मुकर जाऊँ?

एक सवाल पूछती हूँ, आप सभीसे...जो बेहद सामायिक है...हमारी सुरक्षा से निगडित है..हम सभी को इसका जवाब खोजना है.. इसका सामना करने की निहायत ज़रूरत है...वो आतंक वाद को लेके...!

क्या आपलोग Indian Evidence Act २५/२७ के बारेमे जानते हैं? जानते हैं,कि, इसके क्या दुष्परिणाम हैं? के ये १५० साल पुराना, अंग्रेजों ने ख़ुद को बचाए रखने के लिए बनाया क़ानून आज पूरी दुनिया के लिए समस्या बन गया है? हमें निगल रहा है और हम हाथ पे हाथ धरे बैठे है? आख़िर क्यों? हमारी आज़ादी की सालगिरह हमें आतंक के साये में मनानी पड़ती है..आख़िर कबतक?

के, अर्न्तगत सुरक्षा यंत्रणा के हाथ मज़बूत करने के लिए दिए गए सुझाव,उच्च तम न्यायलय के आदेशों के बावजूद पिछले २९ सालों से लागू नही किए गए?

के, जबतक इन क़ानूनों में तब्दीलियाँ नही आतीं, हम आतंक से महफूज़ नहीँ? के अफ़ीम- गाँजा की तस्करी भी जारी रहेगी और हम मुँह तकते रहेंगे?

ये सभी सवाल,एक ही सवाल के तहत हैं...हम हमारे देशकी कानून व्यवस्था के बारेमे कितनी जानकारी रखते हैं? ख़ास कर जहाँ तस्करी से निपटने का प्रश्न आता है ???

हम एक बारूद के ढेर पे बठे हुए हैं/रहेंगे...और निगले जायेंगे,जब तक जागरूक नही बनेंगे....एक लोक तंत्र में सबसे अधिक लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है..आईये ! हम कुछ करें...मिलके..!

शमा

2 टिप्‍पणियां:

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

aap ki baat ekdam sahi hai.....

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

आतंकवाद से निपटने के लिए देश के नुमा इन्दो को सख़्त से सख़्त कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए, भले ही उन्हें क़ानून में संशोधन कराने के लिए सड़क पर क्यों न उतरना पड़े. यह कहना सच तो है पर क्या ये नेता और मन्त्रिगण अपने आकाओं का विरोध कर पाएँगे जो इनकी लड़ाई को बग़ावत समझ का इनकी कुर्सी तक छीनने से बाज़ नहीं आएँगे. वैसे आज सच बात हो या ग़लत संसद में एक दूसरे कि टाँग खींचना एक दूसरे का जन्म सिद्ध अधिकार सा बन गया है. परंतु इस समस्या को राजनीति से ऊपर उठकर हाल करना ही होगा , अन्यथा हमें इस से भी भयंकर परणाम भुगतने को तैयार रहना होगा , क्योंकि आतंकी किसी के भी सगे नहीं हो सकते.
- विजय