मंगलवार, 25 अगस्त 2009


" एक आत्मा की फरियाद "
भगवान ने एक आत्मा को ये बताया है के उसे कन्या के रूप में
धरती पर जाना है तो आत्मा क्या कहती है ------------------------------------
हे भगवान ये क्या कहते हो ,
क्या धरती पर जाना होगा ---?
नहीं नहीं मुझ को मत भेजो,
जाते ही तो आना होगा -----------.
हे ईश्वर मैं तो हूँ कन्या
जिस भी कुल में मैं जाऊंगी
पता नहीं वो कैसा होगा -----?
जीवित क्या मै
ऐसा न हो पापा मम्मी
दे न सकें मुझ को सम्मान
भैया का तो आदर होवे ---
मिले मुझे न जीवन दान .
मालिक मेरे डर लगता है
जीवन शायद प्यार को तरसे
शिक्षा से वंचित रह जाऊं
कह न सकूं कुछ सब के डर से
माना सब कुछ मिल भी गया तो
भाई बहन का आदर मान
माँ पापा का प्यार दुलार
और ज्ञान का भी वरदान
तो भी क्या मैं बच पाऊंगी ?
पति के घर में तेल भी होगा
माचिस की तीली भी होगी
हाथ मेरा पर खाली होगा
तुम तो विघ्न विनाशक हो
जुल्मों के संहारक हो ---
अपनी धरती के लोगों को
मानवता का पाठ पढाओ
फिर मैं धरती पर जाऊंगी
ज़हरा , मरियम और सीता के
पावन पदचिन्हों पर चल कर
इक दिन सब को दिखलाऊंगी ---- .

(आज जब मेरे लिखने की बारी आई तो मुझे केवल इस्मत ज़ैदी , जो कि उभरती हुई शायरा/कवियत्री हैं की याद आई. सोचा अपनी शुरुआत इस्मत की कविता से ही करुँ. यह बेहतरीन रचना आप तक भी पहुंचे.)

10 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

मुझे बहुत पसंद आई रचना

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब रचना...आज के हालात की सही तस्वीर बयां करती हुई...
नीरज

KNKAYASTHA "नीरज" ने कहा…

वंदना जी,
इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है... आशा करता हूँ कि समय-समय पर इस प्रकार की रचनाओं से आप सवाल उठाती रहेंगी...
आपने एक कविता लिखी है और उसमे भी सामाजिक मुद्दे को सही तरीके से उठाया है...

स्थिति ऐसी ही है...आत्मा की आत्मिक दर्द / डर को बखूबी प्रस्तुत करती है यह रचना...
धन्यवाद

अर्चना तिवारी ने कहा…

लाजवाब रचना ...

shama ने कहा…

वन्दना जी ,
बेहद सुंदर रचना पेश की आपने ..
एक रूह से निकली, खामोश फरियाद..पढ़ते,पढ़ते, न जाने क्या,क्या याद आता रहा..आँखें नम होती रहीं..बहुत,बहुत शुक्रिया ..इस रचना से रु-ब-रु करनेके लिए!

ओम आर्य ने कहा…

आप हर एक तरह की लेखन मे माहिर है .......आपकी यह रचना सीधे दिल मे उतर गई ......अतिसुन्दर ........ऐसे ही लिखते रहे !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

आप सबका बौत-बहुत धन्यवाद. एक बात स्पष्ट करना चाहूंगी कि ये रचना मेरी नहीं मेरी मित्र इस्मत ज़ैदी की है.

SACCHAI ने कहा…

sahi chitran sahi alfaz ke saath ....

-----eksacchai {AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

vinay ने कहा…

मार्मिक रचना,इस समाज का सही चित्रण

ज्योति सिंह ने कहा…

जहाँ स्नेह मिला वही बाती-सी जली
मौन मोमबती सी जल -जल गली
मानवीय पादप की अनमनी कली
आंधी तूफ़ान और धूप में पली .
घर की दीवारों ने घोंट दिया दम
सीढ़ी-सी बनी रही रख -रख कर पाँव
जिस पर से गुजर गए ऊधर्व मुखी चाव .
सर्जन का मूल रही ,किन्तु बस अनाम
जननी अनजान रही ,जनको का नाम .
कविता लम्बी है आगे नहीं लिख प् रही ,मगर वंदना जी द्वारा पोस्ट की रचना पढ़ लिखने का इसे मन हुआ .