सोमवार, 24 अगस्त 2009

घर की लक्ष्मी...नहीं...एक इंसान बस

हमारे समाज और देश में लड़की का जन्म अधिकाँशतः एक समस्या का जन्म समझा जाता है...इसके अनेक कारण हैं... और यह वास्तविकता से दूर भी नही है... सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार ढल गई है कि एक विशाल समस्या बनी जा रही है... मैं इन सभी कारणों पे चर्चा तो अभी नहीं करूँगा...केवल एक कारण जो मेरे समझ में सबसे ज्यादा गंभीर है उसपर लिखने का साहस कर रहा हूँ...

शारीरिक शुचिता

यह एक विडम्बना है कि लड़कियों को धर्म और समाज में देवी का स्थान दे दिया गया...और इसके साथ ही मान-मर्यादा का जिम्मा भी उन्ही पर लाद दिया गया---परिवार की मर्यादा, समाज की मर्यादा, वंश की मर्यादा और शायद राष्ट्र की भी मर्यादा... इस तरह जन्म के साथ ही परिवार को लगता है कि लड़कियों को अधिक सुरक्षा की जरुरत है... लोग अपने सगे-सम्बन्धियों की हत्या या दुर्घटना से इतने परेशां नहीं होते जितना कि परिवार की किसी लड़की/महिला के बलात्कार से... क्योंकि मौत के बाद व्यक्ति समाप्त हो जाता है और धीरे-धीरे उसके जाने का गम समाप्त हो जाता है...लेकिन बलात्कार एक अभिशाप बन जाता है सारी जिंदगी का - धार्मिक और सामाजिक कुमान्य्ताओं के कारण... अजीब-अजीब से मुहावरे और विशेषण बने हैं ऐसी लड़कियों या स्त्रियों के लिए...

सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है की समाज और व्यक्तिगत सोच इस तरह ढली हुई है की बलात्कार को को एक हादसा समझा जाता है जिससे उबरा नहीं जा सकता...जबकि यह एक जघन्य अपराध है, एक कुत्सित और विकृत मानसिकता वाले पुरूष के द्वारा किया हुआ... समाज में इस अपराध के होने के विभिन्न कारण गिनाये जाते हैं जो बेबुनियाद हैं...इसका एक मात्र कारण होता है ---एक पुरूष के द्वारा एक स्त्री को उसका स्थान बताना...और सभी देश और काल में यही एक कारण रहा है, मेरी समझ में तो... इसका कानूनी हल जो भी हो, इस प्रकार के अपराध को जघन्यतम श्रेणी में रखना चाहिए...

लीजिये, मैं सही मुद्दे से तो भटक ही गया... मैं कह रहा था कि इस प्रकार की सुरक्षा की चिंता ही है जो लड़की को एक बोझ समझा जाता है... आज जिस परिवार में बोझ नहीं भी समझा जाता है, वहां भी यह चिंता तो लगी ही रहती है... और इसका कोई कानूनी हल नहीं हो सकता... यह पूरे समाज की मानसिकता की वजह से है... धीरे-धीरे ही सही परन्तु इस मानसिकता को बदलना होगा... इसके लिए परिवार, तब विद्यालय और समाज को अपनी बच्चियों को समझाना होगा...और हम सभी को भी यह समझना होगा कि बलात्कार में यदि स्त्री कुछ खोती है तो बलात्कारी भी वही खोता है... फ़िर इस घटना का मानसिक असर केवल स्त्री पर ही नहीं होना चाहिए... यह एक वैसी ही घटना है जैसे किसी ने आपको लूट लिया, या चाकू मारकर घायल कर दिया या किसी गाडीवाले ने टक्कर मार दी... समाज और परिवार को भी इसे इसी रूप में देखना चाहिए...बलात्कारी को समाज से बाहर करिए...उसे अदालत में ले जाइये...सजा दिलवाइए...

मैं जानता हूँ कि शायद यह बात अजीब सी लगे पढने वालों को...परन्तु मेरा आग्रह है कि अब तो सुधरो...स्त्री को मनुष्य रहने दो...देवी मत बनाओ और सामान्य मनुष्य सा जीवन जीने दो... शारीरिक शुचिता की कल्पना-परिकल्पना को गंगा-जमुना में विसर्जित कर दो और थोडी सी जागरूकता आने दो अपनी बच्चियों में में...सेक्स के बारे में, अधिकार के बारे में, जीवन के बारे में... उनके सर पर क्यों लाद दिया है हमने सम्मान, चरित्र एवं शारीरिक शुचिता के बोझ को...

सारा संसार सुखमय और सुंदर हो जाएगा...







7 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बेटियों के प्रति आपकी चिन्ता जायज़ तो है ही, आपका आग्रह भी अमल में लाना होगा. जब तक समाज में बलात्कारियों या अन्य आतताइयों को सज़ा नहीं मिलेगी तब तक बेटियां असुरक्षित हैं. अफसोस तो इस बात का है कि हमारी कानून व्यवस्था ही बेहद लचर है. किसी भी मामले में फ़ैसला होने में इतना वक्त लगता है कि तब तक उस मामले को लोग भूलने ही लगते हैं .यदि सज़ा तत्काल दी जाये तो भावी बलात्कारी शायद कम हो सकें.

shama ने कहा…

वंदना जी ,
आपसे पूरी तरह सहमत हूँ ..हमारी क्रिमिनल justice system इतना घिसा पिटा है ,कि , अपराधी छूट या तो जाता है ,या जबतक केस चलता है ,तबतक , औरत को बुरी तरह न्यायलय में अपमानित होना पड़ता है ..
अपराधी, पोलिस के आगे अपना जुर्म कुबूल भी कर ले फिरभी उसका कुछ बिगड़ता नही..क्योंकि पुलिस की सामने दिया हुआ बयाँ कोर्ट में admisable नही होता..केस अगली, तारिख...अगली तारीख करते हुए अपना कामकाज करता है..पुलिस के अफसर जो तफ्तीश कर रहे होते हैं, उनके तबादले भी हो जाते हैं...पोलिस पे बंधन करक है,कि, वो केस की तफ्तीश ख़त्म कर ३ माह के भीतर कोर्ट में submit कर दे..लेकिन कोर्ट पे कुछ भी बंधन करक नही...कोर्ट उस केस को १० साल लगा दे!

shama ने कहा…

एक और बात ...दो बालिग़ व्यक्ती आपसमे , एक दूसरे की मर्ज़ी से सम्बन्ध रखते हैं , तो कोई कुछ नही कर सकता ..लेकिन जहाँ ज़बरन ये बातें होती हैं ,वहाँ औरत की 'शुचिता ' पे आँच लाना बेहद अन्याय करक है ..इसी कारण अपराध छुपाये जाते हैं ..क्या हर हाल में,aurat की ही शुचिता मायने रखती है?

SACCHAI ने कहा…

ji haan balatkar ek abhishap ban jaata hai jo ek dardnaak hadse ke roop me hota hai ladki ya aurat is hadse me apana sab kuch khoti hai jiski charcha mai apane blog per bhi kar chuka hu http://eksacchai.blogspot.com per ye aapne sahi kaha ki ab bari hai jagrukta ki jab tak hum jagruk nahi hote hai tab tak kuch nahi hoga

------ eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

vinay ने कहा…

स्त्री को तो सारे जीवन की सजा मिल जाती है,यह सजा बलातकारीयो को मिलनी चाहिये

KNKAYASTHA "नीरज" ने कहा…

Main "SACCHAI" ki tipanni pe tipanni kar raha hun kyonki mujhe aitraaz hai is baat se ki "ladki ya aurat is hadse me apana sab kuch khoti hai"...

Yah samaaj me sthapit galat dharna hai aur yah jaanboojh kar bana diya gaya hai... chunki samaj aisa kahta hai ki... isliye ladki ya aurat ko lagta hai ki unhone kuchh kho diya hai...

ek udaharan...
kyonki sab kahte hai ki jo aaj 50,000/- monthly nahi kamata wo successful nahi hai to aise log depression men chale ja sakte hain...

yaa... jo bachchha 95% nahin laa pata wo bekar hai...

yaa...

kitne hi udaharan milenge... ispe vichar avashy karen...

Sunita Sharma ने कहा…

शमा जी
अगर एेसी सजा लडके को मिले मेरा मतलब यदि कोई लडकी लडके से प्यार का वादा शादी का वादा कर सम्बन्ध बना कर बाद में इन्कार कर दे तो उस लडकी को क्या सजा मिलनी चाहिए यदि हां तो सजा क्या होती है ?

आपने मुझे इस ब्लाग पर लिखने को कहा था मै लिखना चाहती हुं।

http://sunitakhatri.blogspot.com
http:swastikachunmun.blogspot.com