सोमवार, 17 अगस्त 2009

सुगंधित फूल बन जाओ

तपन लू की जो हरियाली उठाकर ले ही जाएगी
घटा भी सागरों का जल उड़ाकर ले ही जाएगी

सुगंधित फूल बन जाओ, खिलो डाली की बाहों पर
हवा खुशबू की साँसों को बहाकर ले ही जाएगी

सड़क सुनसान है,गश्ती सिपाही सो गए थककर
हमें भी रात की अंतिम घड़ी घर ले ही जाएगी

घरों का सुख कभी भीतर अहाते के नहीं मिलता
तुम्हें घर की ज़रूरत घर से बाहर ले ही जाएगी

तुम अपने आप पर विश्वास करना सीख लो वर्ना
परेशानी तुम्हें औरों के दर पर ले ही जाएगी

डा. गिरिराज शरण अग्रवाल

7 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

वाह ! क्या खूब लिखा है आपने ! बेहतरीन रहनुमाई ...! एक अनुभवी राही, एक राह से गुज़र, बड़ी ही सद्भावना के साथ, प्यार से , अपनी बात कह रहा है...और हम सुन रहें हैं...मुग्ध होके!

shama ने कहा…

गिरिराज जी ...मेरे पास शुक्रगुज़ारी के अल्फ़ाज़ नहीं हैं ..! अपनी व्यस्तता के बावजूद हमारी हौसला अफज़ाई की ...आपको नमन करती हूँ..

नीरज कुमार ने कहा…

गिरिराज जी,
आपके पहले पोस्ट के लिए धन्यवाद...
बहुत ही अच्छी और समझदारी से भरी ग़ज़ल है...
सभी शेर शानदार है...
इसी प्रकार हमें प्रोत्साहित करते रहें....

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi badhiya rachana ............ek sundar bhaw se labarez rachana

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

गिरिराज जी
बहुत अच्छी रचना है
घरों का सुख कभी भीतर अहाते के नहीं मिलता
तुम्हें घर की ज़रूरत घर से बाहर ले ही जाएगी

क्या बात कही है आपने बहुत अच्छा लगा .
-विजय

अर्चना तिवारी ने कहा…

बहुत शानदार ग़ज़ल....

वाणी गीत ने कहा…

तुम अपने आप पर विश्वास करना सीख लो वर्ना
परेशानी तुम्हें औरों के दर पर ले ही जाएगी
नहीं टूटा जो वो है मुझमे मेरा विश्वास...विश्वास के दम पर ही सब संभव है ..!!