रविवार, 16 अगस्त 2009

घरकी लक्ष्मी...या?

बड़ा दुःख होता है,जब लडकी के जनम के बाद घरमे एक मातम-सा मनाते देखती हूँ..कई कहानियाँ जानती हूँ, जहाँ चार चार बेटों की माँ दरबदर भटकी..घरसे धक्के मार के निकाली गयी.....

घरकी लक्षी' कहलाने वाली औरत, हमेशा 'पराया धन' बनी रही..ना अपने ससुराल में पैर रखनेको हक़ की ज़मीन हासिल, ना नैहर में...! जाए तो कहाँ जाए...?

"woman's day" पे लिखी,अपनी ही एक रचना पेश कर रही हूँ...!

एक बगिया बनाएँ...

जब एक बूँद नूरकी,
भोलेसे चेहरे पे किसी,
धीरेसे है टपकती ,
दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,
मुसकाती हैं होटोंकी,
वही तो कविता कहलाती!

क्यों हम उसे गुनगुनाते नही?
क्यों बाहोंमे झुलाते नही?
क्यों देते हैं घोंट गला?
करतें हैं गुनाह ऐसा?
जो काबिले माफी नही?
फाँसी के फँदेके सिवा इसकी,
दूसरी कोई सज़ा नही??

किससे छुपाते हैं ये करतूते,
अस्तित्व जिसका चराचर मे,
वो हमारा पालनहार,
वो हमारा सर्जनहार,
कुछभी छुपता है उससे??
देखता हजारों आँखों से!!
क्या सचमे हम समझ नही पाते?

आओ, एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
मत असमय चुन लेना,
इन्हें फूलने देना,
एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"

3 टिप्‍पणियां:

hem pandey ने कहा…

एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"
-वह दिन आना शुरू हो गया है.

ओम आर्य ने कहा…

आओ, एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
मत असमय चुन लेना,
इन्हें फूलने देना,
एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"

bahut hi sundar sandesh jiski jarurat hai samaaaj ko ......samaaj ki maansikata ko jagaana jaruri hai ...........badhaaee

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

शमा जी
"एक बगिया बनाएँ " के माध्यम से आपने एक ज्वलंत प्रश्न को उठाया है, जिस पर यादा कदा बहस तो होती ही रहती है, मगर इसे अब तक जन-सामान्य के अभियान के रूप में नहीं लिया जा सका है . गुज़ारिश है सामाजिक संस्थाओं के सक्रिय सदस्यों से कि वे अपने लेखन और अपने प्रयासों से इस समस्या को जन सामान्य तक पहुँचाएँ और जागरूकता लाने के लिए अभियान चलाएँ.
मुझे क्या शायद किसी भी प्रबुद्ध को सहयोग करने में कोई कठिनाई नहीं होना चाहिए.
- विजय