शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

गज़ब कानून..१...आतंकके ख़िलाफ़ जंग..

इस ज़रूरी संस्मरण को लिखना चाहती हूँ...वजह है अपने१५० साल पुराने, इंडियन एविडेंस एक्ट,(IEA) कलम २५ और २७ के तहेत बने कानून जिन्हें बदल ने की निहायत आवश्यकता है....इन क़ानूनों के रहते हम आतंकवाद से निगडित या अन्य तस्करीसे निजाद पाही नही सकते...

इन क़ानूनों मेसे एक क़ानून के परिणामों का , किसीने आँखों देखा सत्य प्रस्तुत कर रही हूँ.....
CHRT( कॉमनवेल्थ ह्युमन राइट्स इनिशियेटिव .....Commonwealth Human Rights Initiative), ये संघटना 3rd वर्ल्ड के तहत आनेवाले देशों मे कार्यरत है।
इसके अनेक उद्दिष्ट हैं । इनमेसे,निम्लिखित अत्यन्त महत्त्व पूर्ण है :
अपने कार्यक्षेत्र मे reforms को लेके पर्याप्त जनजागृती की मुहीम, ताकि ऐसे देशोंमे Human Rights की रक्षा की जा सके।
ये संघटना, इस उद्दिष्ट प्राप्ती के लिए अनेक चर्चा सत्र ( सेमिनार) तथा debates आयोजित करती रहती है।
ऐसेही एक चर्चा सत्र का आयोजन,नयी देहली, २००२ की अगस्त में, किया गया था। इस सत्र के अध्यक्षीय स्थानपे उच्चतम न्यायालयके तत्कालीन न्यायाधीश थे। तत्कालीन उप राष्ट्रपती, माननीय श्री भैरव सिंह शेखावत ( जो एक पुलिस constable की हैसियतसे ,राजस्थान मे कार्यरत रह चुके हैं), मुख्य वक्ता की तौरपे मौजूद थे।

उक्त चर्चासत्र मे देशके हर भागसे अत्यन्त उच्च पदों पे कार्यरत या अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्रों से ताल्लुक रखनेवाली हस्तियाँ मोजूद थीं : आला अखबारों के नुमाइंदे, न्यायाधीश ( अवकाश प्राप्त या कार्यरत) , आला अधिकारी,( पुलिस, आईएस के अफसर, अदि), वकील और अन्य कईं। अपने अपने क्षेत्रों के रथी महारथी। हर सरकारी महकमों के अधिकारियों के अलावा, अनेक गैर सरकारी संस्थायों के प्रतिनिधी भी वहाँ हाज़िर थे। (NGOs)

जनाब शेखावत ने विषयके मर्मको जिस तरहसे बयान किया, वो दिलो दिमाग़ को झक झोर देने की क़ाबिलियत रखता है।
उन्होंने, उच्चतम न्यायलय के न्यायमूर्ती( जो ज़ाहिर है व्यास्पीठ्पे स्थानापन्न थे), की ओर मुखातिब हो, किंचित विनोदी भावसे क्षमा माँगी और कहा,"मेरे बयान को न्यायालय की तौहीन मानके ,उसके तहेत समन्स ना भेज दिए जाएँ!"
बेशक, सपूर्ण खचाखच भरे सभागृह मे एक हास्य की लहर फ़ैल गयी !
श्री शेखावत ने , कानूनी व्यवस्थाकी असमंजसता और दुविधाका वर्णन करते हुए कहा," राजस्थान मे जहाँ, मै ख़ुद कार्यरत था , पुलिस स्टेशन्स की बेहद लम्बी सीमायें होती हैं। कई बार १०० मीलसे अधिक लम्बी। इन सीमायों की गश्त के लिए पुलिस का एक अकेला कर्मचारी सुबह ऊँट पे सवार हो निकलता है। उसके साथ थोडा पानी, कुछ खाद्य सामग्री , कुछ लेखनका साहित्य( जैसे कागज़ पेन्सिल ) तथा लाठी आदि होता है।

"मै जिन दिनों की बात कर रहा हूँ ( और आजभी), भारत पाक सीमापे हर तरह की तस्करी, अफीम गांजा,( या बारूद तथा हथियार भी हुआ करते थे ये भी सत्य है.....जिसका उनके रहते घटी घटनामे उल्लेख नही था) ये सब शामिल था, और है।

एक बात ध्यान मे रखी जाय कि नशीले पदार्थों की कारवाई करनेके लिए ,मौजूदा कानून के तहेत कुछ ख़ास नियम/बंधन होते हैं। पुलिस कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, या सब -इंस्पेक्टर, इनकी तहकीकात नही कर सकता। इन पदार्थों की तस्करी करनेवाले पे, पंचनामा करनेकी विधी भी अन्य गुनाहों से अलग तथा काफी जटिल होती है।"
उन्होंने आगे कहा," जब एक अकेला पुलिस कर्मी , ऊँट पे सवार, मीलों फैले रेगिस्तानमे गश्त करता है, तो उसके हाथ कभी कभार तस्कर लगही जाता है।

"क़ानूनन , जब कोई मुद्देमाल पकडा जाता है, तब मौक़ाये वारदात पेही( और ये बात ह्त्या के केस के लिएभी लागू है ), एक पंचनामा बनाना अनिवार्य होता है। ऐसे पंचनामे के लिए, उस गाँव के या मुहल्ले के , कमसे कम दो 'इज्ज़तदार' व्यक्तियों का उपस्थित रहना ज़रूरी है।"

श्री शेखावत ने प्रश्न उठाया ," कोईभी मुझे बताये , जहाँ मीलों किसी इंसान या पानीका नामो निशाँ तक न हो , वहाँ, पञ्च कहाँ से उपलब्ध कराये जाएँ ? ? तो लाज़िम है कि , पुलिसवाला तस्करको पकड़ अपनेही ही ऊँट पे बिठा ले। अन्य कोई चारा तो होता ही नही।

"उस तस्करको पकड़ रख, वो पुलिसकर्मी सबसे निकटतम बस्ती, जो २०/ २५ किलोमीटर भी हो सकती है, ले जाता है। वहाँ लोगोंसे गिडगिडा के दो " इज्ज़तदार व्यक्तियों" से इल्तिजा करता है। उन्हें पञ्च बनाता है।
" अब कानूनन, पंचों को आँखों देखी हक़ीक़त बयान करनी होती है। लेकिन इसमे, जैसा भी, वो पुलिसकर्मी अपनी समझके अनुसार बताता है, वही हक़ीक़त दर्ज होती है।

"पञ्च" एक ऐसी दास्तान पे हस्ताक्षर करते हैं, जिसके वो चश्मदीद गवाह नही। लेकिन कानून तो कानून है ! बिना पंचानेमेके केस न्यायालय के आधीन होही नही सकता !!

" खैर! पंचनामा बन जाता है। और तस्कर या जोभी आरोपी हो, वो पुलिस हिरासतसे जल्द छूट भी जता है। वजह ? उसके बेहद जानकार वकील महोदय उस पुलिस केस को कानून के तहेत गैरक़ानूनी साबित करते हैं!!!तांत्रिक दोष...A technical flaw !

" तत्पश्च्यात, वो तस्कर या आरोपी, फिर से अपना धंदा शुरू कर देता है। पुलिस पे ये बंधन होता है की ३ माह के भीतर वो अपनी सारी तहकीकात पूरी कर, न्यायालयको सुपुर्द कर दे!! अधिकतर ऐसाही होता है, येभी सच है ! फिर चाहे वो केस, न्यायलय की सुविधानुसार १० साल बाद सुनवाईके लिए पेश हो या निपटाया जाय....!

"अब सरकारी वकील और आरोपी का वकील, इनमे एक लम्बी, अंतहीन कानूनी जिरह शुरू हो जाती है...."
फिर एकबार व्यंग कसते हुए श्री शेखावत जी ने कहा," आदरणीय जज साहब ! एक साधारण व्यक्तीकी कितनी लम्बी याददाश्त हो सकती है ? २ दिन २ माह या २ सालकी ??कितने अरसे पूर्व की बात याद रखना मुमकिन है ??
ये बेहद मुश्किल है कि कोईभी व्यक्ती, चश्मदीद गवाह होनेके बावजूद, किसीभी घटनाको तंतोतंत याद रखे !जब दो माह याद रखना मुश्किल है तब,१० सालकी क्या बात करें ??" (और कई बार तो गवाह मरभी जाते हैं!)

" वैसेभी इन २ पंचों ने (!!) असलमे कुछ देखाही नही था! किसीके " कथित" पे अपने हस्ताक्षर किए थे ! उस "कथन" का झूठ साबित करना, किसीभी वकील के बाएँ हाथका खेल है ! और वैसेभी, कानून ने तहत, किसीभी पुलिस कर्मी के( चाहे वो कित्नाही नेक और आला अफसर क्यों न हो ,) मौजूदगी मे दिया गया बयान ,न्यायलय मे सुबूतके तौरपे ग्राह्य नही होता ! वो इक़्बालिये जुर्म कहलाही नही सकता।( चाहे वो ह्त्या का केस हो या अन्य कुछ)।

(IEA ) कलम २५ तथा २७ , के तहत, ये व्यवस्था अंग्रेजों ने १५० साल पूर्व कर रखी थी, अपने ख़ुद के बचाव के लिए,जो आजतक क़ायम है ! कोई बदलाव नही ! ज़ाहिरन, किसीभी पुलिस करमी पे, या उसकी बातपे विश्वास किया ही नही जा सकता ऐसा क़ानून कहता है!! फिर ऐसे केसका अंजाम क्या होगा ये तो ज़ाहिर है !"

गज़ब क़ानून ! २)

जारी है, श्री शेखावत, भारत के माजी उपराष्ट्रपती के द्वारा दिए गए भाषण का उर्वरित अंश:
श्री शेखावतजी ने सभागृह मे प्रश्न उपस्थित किया," ऐसे हालातों मे पुलिसवालों ने क्या करना चाहिए ? क़ानून तो बदलेगा नही...कमसे कम आजतक तो बदला नही ! ना आशा नज़र आ रही है ! क़ानूनी ज़िम्मेदारियों के तहत, पुलिस, वकील, न्यायव्यवस्था, तथा कारागृह, इनके पृथक, पृथक उत्तरदायित्व हैं।

"अपनी तफ़तीश पूरी करनेके लिए, पुलिस को अधिकसे अधिक छ: महीनोका कालावधी दिया जाता है। उस कालावाधीमे अपनी सारी कारवाई पूरी करके, उन्हें न्यायालय मे अपनी रिपोर्ट पेश करनेकी ताक़ीद दी जाती है। किंतु, न्यायलय पे केस शुरू या ख़त्म करनेकी कोई समय मर्यादा नही, कोई पाबंदी नही ! "

शेखावतजीने ऐलानिया कहा," पुलिस तक़रीबन सभी केस इस समय मर्यादा के पूर्व पेश करती है!"( याद रहे, कि ये भारत के उपराष्ट्रपती के उदगार हैं, जो ज़ाहिरन उस वक़्त पुलिस मेहेकमेमे नही थे....तो उनका कुछ भी निजी उद्दिष्ट नही था...नाही ऐसा कुछ उनपे आरोप लग सकता है!)


"अन्यथा, उनपे विभागीय कारवाई ही नही, खुलेआम न्यायलय तथा अखबारों मे फटकार दी जाती है, बेईज्ज़ती की जाती है!! और जनता फिर एकबार पुलिस की नाकामीको लेके चर्चे करती है, पुलिसकोही आरोपी के छूट जानेके लिए ज़िम्मेदार ठहराती है। लेकिन न्यायलय के ऊपर कुछभी छींटा कशी करनेकी, किसीकी हिम्मत नही होती। जनताको न्यायलय के अवमान के तहत कारवाई होनेका ज़बरदस्त डर लगता है ! खौफ रहता है ! "


तत्कालीन उप राष्ट्रपती महोदयने उम्मीद दर्शायी," शायद आजके चर्चा सत्र के बाद कोई राह मिल जाए !"
लेकिन उस चर्चा सत्रको तबसे आजतक ७ साल हो गए, कुछभी कानूनी बदलाव नही हुए।

उस चर्चा सत्र के समापन के समय श्री लालकृष्ण अडवानी जी मौजूद थे। ( केन्द्रीय गृहमंत्री के हैसियतसे पुलिस महेकमा ,गृहमंत्रालय के तहेत आता है , इस बातको सभी जानतें हैं)।
समारोप के समय, श्री अडवाणीजी से, (जो लोह्पुरुष कहलाते हैं ), भरी सभामे इस मुतल्लक सवाल भी पूछा गया। ना उन्ह्नों ने कोई जवाब दिया ना उनके पास कोई जवाब था।
बता दूँ, के ये चर्चा सत्र, नेशनल पुलिस commission के तहेत ( 1981 ) , जिसमे डॉ. धरमवीर ,ICS , ने , पुलिस reforms के लिए , अत्यन्त उपयुक्त सुझाव दिए थे, जिन्हें तुंरत लागू करनेका भारत के अत्युच्च न्यायलय का आदेश था, उनपे बेहेस करनेके लिए...उसपे चर्चा करनेके लिए आयोजित किया गया था। आजभी वही घिसेपिटे क़ानून लागू हैं।


उन सुझावों के बाद और पहलेसे ना जाने कितने अफीम गांजा के तस्कर, ऐसे क़ानूनों का फ़ायदा उठाते हुए छूट गए...ना जाने कितने आतंकवादी बारूद और हथियार लाते रहे, क़ानून के हथ्थेसे छूटते गए, कितने बेगुनाह मारे गए, कितनेही पुलिसवाले मारे गए.....और कितने मारे जायेंगे, येभी नही पता।
ये तो तकरीबन १५० साल पुराने क़ानूनों मेसे एक उदाहरण हुआ। ऐसे कई क़ानून हैं, जिनके बारेमे भारत की जनता जानती ही नही....!


मुम्बई मे हुए ,सन २००८, नवम्बर के बम धमाकों के बाद, २/३ पहले एक ख़बर पढी कि अब e-कोर्ट की स्थापना की जा रही है। वरना, हिन्दुस्तान तक चाँद पे पोहोंच गया, लेकिन किसी आतंक वादीके मौजूदगी की ख़बर लखनऊ पुलिस गर पुणे पुलिस को फैक्स द्वारा भेजती, तो न्यायलय उसे ग्राह्य नही मानता ...ISIका एजंट पुणे पुलिसको छोड़ देनेकी ताकीद न्यायलय ने की ! वो तो लखनऊसे हस्त लिखित मेसेज आनेतक, पुणे पुलिस ने उसपे सख्त नज़र रखी और फिर उस एजंट को धर दबोचा।
समाप्त

मंगलवार, 25 अगस्त 2009


" एक आत्मा की फरियाद "
भगवान ने एक आत्मा को ये बताया है के उसे कन्या के रूप में
धरती पर जाना है तो आत्मा क्या कहती है ------------------------------------
हे भगवान ये क्या कहते हो ,
क्या धरती पर जाना होगा ---?
नहीं नहीं मुझ को मत भेजो,
जाते ही तो आना होगा -----------.
हे ईश्वर मैं तो हूँ कन्या
जिस भी कुल में मैं जाऊंगी
पता नहीं वो कैसा होगा -----?
जीवित क्या मै
ऐसा न हो पापा मम्मी
दे न सकें मुझ को सम्मान
भैया का तो आदर होवे ---
मिले मुझे न जीवन दान .
मालिक मेरे डर लगता है
जीवन शायद प्यार को तरसे
शिक्षा से वंचित रह जाऊं
कह न सकूं कुछ सब के डर से
माना सब कुछ मिल भी गया तो
भाई बहन का आदर मान
माँ पापा का प्यार दुलार
और ज्ञान का भी वरदान
तो भी क्या मैं बच पाऊंगी ?
पति के घर में तेल भी होगा
माचिस की तीली भी होगी
हाथ मेरा पर खाली होगा
तुम तो विघ्न विनाशक हो
जुल्मों के संहारक हो ---
अपनी धरती के लोगों को
मानवता का पाठ पढाओ
फिर मैं धरती पर जाऊंगी
ज़हरा , मरियम और सीता के
पावन पदचिन्हों पर चल कर
इक दिन सब को दिखलाऊंगी ---- .

(आज जब मेरे लिखने की बारी आई तो मुझे केवल इस्मत ज़ैदी , जो कि उभरती हुई शायरा/कवियत्री हैं की याद आई. सोचा अपनी शुरुआत इस्मत की कविता से ही करुँ. यह बेहतरीन रचना आप तक भी पहुंचे.)

सोमवार, 24 अगस्त 2009

पर्यावरण पर चिंतन ???...

चारों ओर प्रदूषण का डर ।
थोड़ा सोचें अपने अन्दर ॥
वृक्ष लगायें, कटें न वन ।
करें न दूषित, धरा-गगन ॥

इनको दोस्त बनाना होगा ।
पर्यावरण बचाना होगा ॥
----))०((---
मन-भावन हरियाले वन ।
निर्मल जल, स्वच्छंद पवन ॥

निर्भय प्राणी करें गमन ।
करें न इनका, कभी हनन ॥

रुख कठोर अपनाना होगा ।
हरित स्वरूप बचना होगा ॥
----))०((---
हम सबका हो यही प्रयास ।
कभी न हो जंगल का ह्रास ॥

सृष्टि का ये सृजन अनूप ।
कर न पाये कोई कुरूप ॥

रक्षा भाव जगाना होगा ।
वन अस्तित्व बचना होगा ॥
- विजय तिवारी " किसलय "

घर की लक्ष्मी...नहीं...एक इंसान बस

हमारे समाज और देश में लड़की का जन्म अधिकाँशतः एक समस्या का जन्म समझा जाता है...इसके अनेक कारण हैं... और यह वास्तविकता से दूर भी नही है... सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार ढल गई है कि एक विशाल समस्या बनी जा रही है... मैं इन सभी कारणों पे चर्चा तो अभी नहीं करूँगा...केवल एक कारण जो मेरे समझ में सबसे ज्यादा गंभीर है उसपर लिखने का साहस कर रहा हूँ...

शारीरिक शुचिता

यह एक विडम्बना है कि लड़कियों को धर्म और समाज में देवी का स्थान दे दिया गया...और इसके साथ ही मान-मर्यादा का जिम्मा भी उन्ही पर लाद दिया गया---परिवार की मर्यादा, समाज की मर्यादा, वंश की मर्यादा और शायद राष्ट्र की भी मर्यादा... इस तरह जन्म के साथ ही परिवार को लगता है कि लड़कियों को अधिक सुरक्षा की जरुरत है... लोग अपने सगे-सम्बन्धियों की हत्या या दुर्घटना से इतने परेशां नहीं होते जितना कि परिवार की किसी लड़की/महिला के बलात्कार से... क्योंकि मौत के बाद व्यक्ति समाप्त हो जाता है और धीरे-धीरे उसके जाने का गम समाप्त हो जाता है...लेकिन बलात्कार एक अभिशाप बन जाता है सारी जिंदगी का - धार्मिक और सामाजिक कुमान्य्ताओं के कारण... अजीब-अजीब से मुहावरे और विशेषण बने हैं ऐसी लड़कियों या स्त्रियों के लिए...

सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है की समाज और व्यक्तिगत सोच इस तरह ढली हुई है की बलात्कार को को एक हादसा समझा जाता है जिससे उबरा नहीं जा सकता...जबकि यह एक जघन्य अपराध है, एक कुत्सित और विकृत मानसिकता वाले पुरूष के द्वारा किया हुआ... समाज में इस अपराध के होने के विभिन्न कारण गिनाये जाते हैं जो बेबुनियाद हैं...इसका एक मात्र कारण होता है ---एक पुरूष के द्वारा एक स्त्री को उसका स्थान बताना...और सभी देश और काल में यही एक कारण रहा है, मेरी समझ में तो... इसका कानूनी हल जो भी हो, इस प्रकार के अपराध को जघन्यतम श्रेणी में रखना चाहिए...

लीजिये, मैं सही मुद्दे से तो भटक ही गया... मैं कह रहा था कि इस प्रकार की सुरक्षा की चिंता ही है जो लड़की को एक बोझ समझा जाता है... आज जिस परिवार में बोझ नहीं भी समझा जाता है, वहां भी यह चिंता तो लगी ही रहती है... और इसका कोई कानूनी हल नहीं हो सकता... यह पूरे समाज की मानसिकता की वजह से है... धीरे-धीरे ही सही परन्तु इस मानसिकता को बदलना होगा... इसके लिए परिवार, तब विद्यालय और समाज को अपनी बच्चियों को समझाना होगा...और हम सभी को भी यह समझना होगा कि बलात्कार में यदि स्त्री कुछ खोती है तो बलात्कारी भी वही खोता है... फ़िर इस घटना का मानसिक असर केवल स्त्री पर ही नहीं होना चाहिए... यह एक वैसी ही घटना है जैसे किसी ने आपको लूट लिया, या चाकू मारकर घायल कर दिया या किसी गाडीवाले ने टक्कर मार दी... समाज और परिवार को भी इसे इसी रूप में देखना चाहिए...बलात्कारी को समाज से बाहर करिए...उसे अदालत में ले जाइये...सजा दिलवाइए...

मैं जानता हूँ कि शायद यह बात अजीब सी लगे पढने वालों को...परन्तु मेरा आग्रह है कि अब तो सुधरो...स्त्री को मनुष्य रहने दो...देवी मत बनाओ और सामान्य मनुष्य सा जीवन जीने दो... शारीरिक शुचिता की कल्पना-परिकल्पना को गंगा-जमुना में विसर्जित कर दो और थोडी सी जागरूकता आने दो अपनी बच्चियों में में...सेक्स के बारे में, अधिकार के बारे में, जीवन के बारे में... उनके सर पर क्यों लाद दिया है हमने सम्मान, चरित्र एवं शारीरिक शुचिता के बोझ को...

सारा संसार सुखमय और सुंदर हो जाएगा...







गुरुवार, 20 अगस्त 2009

अर्थी तो उठी..३ (अन्तिम)

पिछली किश्त में मैंने बताया की, तसनीम की दिमागी हालत बिगड़ती जा रहे थी...लेकिन उसकी गंभीरता मानो किसी को समझ में नही आ रही थी...

उसे फिर एकबार अपने पती के पास लौट जाने के लिया दबाव डाला जा रहा था..जब कि, पतिदेव ख़ुद नही चाहते थे कि,वो लौटे...हाँ..बेटा ज़रूर उन्हें वापस चाहिए था..!

हम लोग उन दिनों एक अन्य शहर में तबादले पे थे। दिन का समय था...मेरी तबियत ज़रा खराब थी...और मै , रसोई के काम से फ़ारिग हो, बिस्तर पे लेट गयी थी...तभी फोन बजा....लैंड लाइन..मैंने उठा लिया..दूसरी ओर से आवाज़ आयी,
" तसनीम चली गयी..." आवाज़ हमारे एक मित्र परिवार में से किसी महिला की थी...
मैंने कहा," ओह ! तो आख़िर अमेरिका लौट ही गयी..पता नही,आगे क्या होगा...!"

उधर से आवाज़ आयी," नही...अमेरिका नही..वो इस दुनियाँ से चली गयी और अपने साथ अपने बेटे को भी ले गयी...बेटी बच गयी...उसने अपने बेटे के साथ आत्महत्या कर ली..."
मै: ( अबतक अपने बिस्तर पे उठके बैठ गयी थी)" क्या? क्या कह रही हो? ये कैसे...कब हुआ? "

मेरी मती बधीर-सी हो रही थी...दिल से एक सिसकती चींख उठी...'नही...ये आत्महत्या नही..ये तो सरासर हत्या है..आत्महत्या के लिए मजबूर कर देना,ये हत्या ही तो है..'

खैर! मैंने अपने पती को इत्तेला दे दी...वे तुंरत मुंबई के लिए रवाना हो गए...
बातें साफ़ होने लगीं..तसनीम ने एक बार किसी को कहा था,' मेरी वजह से, मेरे भाई की ज़िंदगी में बेवजह तनाव पैदा हो रहे हैं..क्या करूँ? कैसे इन उलझनों को सुलझाऊँ? '

तसनीम समझ रही थी,कि, उसकी भाभी को वो तथा उसके बच्चों का वहाँ रहना बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था...उसके बच्चे भी, अपनी मामी से डरे डरे-से रहते थे..जब सारे रास्ते बंद हुए, तो उसने आत्म हत्या का रास्ता चुन लिया..पिता कैंसर के मरीज़ थे..माँ दिल की मरीज़ थी..तसनीम जानती थी,कि, इनके बाद उसका कोई नही..कोई नही जो,उसे समझ सकगा..सहारा दे सकेगा..और सिर्फ़ अकेले मर जाए तो बच्चे अनाथ हो,उनपे पता नही कितना मानसिक अत्याचार हो सकता है????

उसने अपने दोनों बच्चों के हाथ थामे,और १८ मंज़िल जहाँ , उसके माँ-पिता का घर था, छलांग लगा दी...दुर्भाग्य देखिये..बेटी किंचित बड़ी होने के कारण, उसके हाथ से छूट गयी..लेकिन उस बेटी ने क्या नज़ारा देखा ? जब नीचे झुकी तो? अपनी माँ और नन्हें भाई के खून से सने शरीर...! क्या वो बच्ची,ता-उम्र भुला पायेगी ये नज़ारा?

अब आगे क्या हुआ? तसनीम की माँ दिल की मरीज़ तो थी ही..लेकिन,जब पुलिस उनके घर तफ्तीश के लिए आयी तो इस महिला का बड़प्पन देखिये..उसने कहा," मेरी बेटी मानसिक तौर से पीड़ित थी..मेरी बहू या बेटे को कोई परेशान ना करना॥"

इतना कहना भर था,और उसे दिलका दौरा पड़ गया..जिस स्ट्रेचर पे से बेटी की लाश ऊपर लाई गयी,उसी पे माँ को अस्पताल में भरती कराया गया..तीसरे दिन उस माँ ने दम तोड़ दिया...उसके आख़री उदगार, उसकी, मृत्यु पूर्व ज़बानी( dying declaration)मानी गयी..घर के किसी अन्य सदस्य पे कोई इल्ज़ाम नही लगा...!

इस बच्ची का क्या हुआ? यास्मीन के नाम पे उसके पिता ने अपनी एक जायदाद कर रखी थी..ये जायदाद, एक मशहूर पर्वतीय इलाकेमे थी...पिता ने इस गम के मौक़े पे भी ज़हीन संजीदगी दिखायी..उन्हीं के बिल्डिंग में रहने वाले मशहूर वकील को बुला, तुंरत उस जायदाद को एक ट्रस्ट में तब्दील कर दिया, ताकि,दामाद उस पे हक ज़माने ना पहुँच जाय..
और कितना सही किया उन्हों ने...! दामाद पहुँच ही गया..उस जायदाद के लिए..बेटी को तो एक नज़र भर देखने में उसे चाव नही था...हाँ..गर बेटा बचा होता तो उसे वो ज़रूर अपने साथ ले गया होता..

उस बेटी के पास अब कोई चारा नही था..उसे अपने मामा मामी के पासही रहना पड़ गया..घर तो वैसे उसके नाना का था...! लेकिन इस हादसे के बाद जल्द ही, तसनीम के भाई ने अपने पिता को मुंबई छोड़, एक पास ही के महानगर में दो मकान लेने के लिए मजबूर कर दिया..अब ना इस बच्ची को उनसे मिलने की इजाज़त मिलती..नाही उनके अपने बच्चे उनसे मिलने जाते..उनके मनमे तो पूरा ज़हर भर दिया गया..इस वृद्ध का मानसिक संतुलन ना बिगड़ता तो अजीब बात होती..जिसने एक साथ अपनी बेटी, नवासा और पत्नी को खोया....

इस बच्ची ने अपने सामने अपनी माँ और भाई को मरते देखा..और तीसरे दिन अपनी नानी को...! इस बात को बीस साल हो गए..उस बच्ची पे उसकी मामा मामी ने जो अत्याचार किए, उसकी चश्मदीद गवाह रही हूँ..इतनी संजीदा बच्ची थी..इस असुरक्षित मौहौल ने उसे विक्षप्त बना दिया..वो ख़ुद पर से विश्वास खो बैठी...कोई घड़ी ऐसी नही होती, जब वो अपनी मामी या मामा से झिड़की नही सुनते..ताने नही सुनती....अपने मामा के बच्चे..जो उसके हम उम्र थे...वो भी, इन तानों में, झिड़कियों में शामिल हो जाते...

ये भी कहूँ,कि, आजतलक,उस बच्ची के मुँह से किसी ने उस घटना के बारेमे बात करते सुना,ना, अपनी मामा मामी या उनके बच्चों के बारेमे कुछ सुना...जैसे उसने ये सारे दर्द,उसने अपने सीनेमे दफना दिए....

ट्रस्ट में इस बात का ज़िक्र था कि, जब वो लडकी, १८ साल की हो जाय,तो उस जायदाद को उसके हवाले कर दिया जाय..वो भी नही हुआ..

मामाकी,अलगसे कोई कमाई नही थी...अपने बाप की जायदाद बेच जो पैसा मिला, उसमे से उसने,अलग,अलग जायदाद,तथा share खरीदे...और वही उन सबका उदर निर्वाह बना..और खूब अच्छे-से...बेटा बाहर मुल्क में चला गया..तसनीम की माँ के बैंक लॉकर में जो गहने-सोना था, बहू ने बेच दिया...ससुर के घर में जो चांदी के बर्तन थे, धीरे,धीरे अपने घर लाती गयी...और परदेस की पर्यटन बाज़ी उसी में से चलती रही...

अब अगर मै कहूँ,कि, काश वो बद नसीब बच्ची नही बचती तो अच्छा होता,तो क्या ग़लत होगा? उसकी पढ़ाई तो हुई..क्योंकि,अन्यथा, मित्र गण क्या कहते? इस बात का डर तो मामा मामी को था..लेकिन पढाई के लिए पैसे तो उस बच्ची के नाना दे रहे थे! उस बच्ची को बारह वी के बाद सिंगापूर एयर लाइन की शिष्य वृत्ती मिली..उसे बताया ही नही गया..ये सोच कि,वहाँ न जाने क्या गुल खिलायेगी...! जो गुल उसने नही खिलाये, वो इनकी अपनी औलाद ने खिला दिए..इनकी अपनी बेटी ने क्या कुछ नही करतब दिखाए?

इन हालातों में तसनीम के पास आत्म हत्या के अलावा क्या पर्याय था? वो तो अपने भाई का घर बिखरने से बचाना चाह रही थी...! गर उसकी मानसिक हालत को लेके,उसके सगे सम्बन्धियों सही समय पे दक्षता दिखायी होती,तो ये सब नही होता...पर वो अपने पती के घर लौट जाय,यही सलाह उसे बार बार मिली...और अंत में उसने ईश्वर के घर जाना पसंद कर लिया...मजबूर होके!

उस बच्ची का अबतक तो ब्याह नही हुआ..आगे की कहानी क्या मोड़ लेगी नही पता..लेकिन इस कहानी को बयाँ किया..यही सोच,कि, क्यों एक औरत को हर हाल में समझौता कर लेने के लिए मजबूर किया जाता है? इस आत्महत्या को न मै कायरता समझती हूँ,ना गुनाह..हाँ,एक ज़ुल्म,एक हत्या ज़रूर समझती हूँ...ज़ुल्म उस बच्ची के प्रती भी...जिसने आज तलक अपना मुँह नही खोला..हर दर्द अंदरही अन्दर पी गयी...

घिरे हैं हम सवाल से हमे जवाब चाहिये

शमा जी ने कहा "एक सवाल तुम करो " और मुझे बहुत पुराना वो गीत याद आ गया " एक सवाल तुम करो ,एक सवाल मैं करूँ ,हर सवाल का जवाब ही सवाल है.."इस गीत को अगर आप ध्यान से सुने तो सचमुच ऐसा ही है ,सवाल का जवाब खत्म होते होते वह फिर सवाल बन जाता है ।क्या हम लोगों के जीवन में भी ऐसा ही नही घटित होता? शलभ जी की प्रसिद्ध कविता है " घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिये ,जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिये.." रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम जने कितने ही सवालो से घिरे हैं । रोज़ी-रोटी का सवाल,बच्चों की शिक्षा का सवाल, अच्छे स्वास्थ्य का सवाल,रहने के लिये एक ठिकाने का सवाल . और जो इन सवालों के जवाब दे सकते हैं वे कहते हैं कि सवाल मत करो ..तुम्हे सवाल करने का कोई हक़ ही नही है . हम कहते है कि नहीं इनकी ज़रूरत है तो वे निहायत ग़ैरज़रूरी चीज़ों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर कह्ते है .. ये ज़रूरी है इन्हे देखो . कि आपके घर टी.वी. में कितने चैनल आते हैं,आपके बच्चे को नूडल्स पिज़्ज़ा वगैरह मिलता है या नहीं,आपके पास महंगा वाला मोबाईल है या नहीं । हो सकता है आप को यह सही लगता हो लेकिन इस बात की तह में जाईये आपको इसका अर्थ समझ मे आ जायेगा । चलिये आप इस बात पर सोचिये और सोचते हुए मेरी यह कविता पढ़िये ..भाषण से बेहतर कविता होती है.- शरद कोकास

ज़रूरत

क्या ज़रूरी है
दिया जाए कोई बयान
ज़रूरतों के बारे में
पेश की जाए कोई फेहरिस्त
हलफनामा दिया जाए

चिड़िया से पूछा जाए
क्यों ज़रूरी है अनाज का दाना
चूल्हे से तलब की जाए आग की ज़रूरत
पशुओं से मांगा जाए घास का हिसाब
कपड़ों से कपास का
छप्पर से बाँस का हिसाब मांगा जाए
हल्दी से पूछी जाए
हाथ पीले होने की उमर
दवा की शीशी से पूछा जाए
दवा का असर
फूलों से रंगत की
बच्चों से हँसी की ज़रूरत पूछी जाए
क्या ज़रूरी है
हर ज़रूरी चीज़ के बारे में
किया जाए कोई सवाल ।

- शरद कोकास
(चित्र गूगल से साभार)

बुधवार, 19 अगस्त 2009

अर्थी तो उठी...२

आगेका भाग लिखने जा रही हूँ....
'नुक्कड़' लोग पे वाणी जी ने कहा, आत्महत्या पर्याय नही। हमें पहले ये जान लेना होगा कि, वजूहात कैसे और कौनसे रहे। आत्महत्या करने वाले व्यक्ती मे अक्सर 'sirotinin'की मात्रा कम पाई जाती है..ये एक वैद्यकीय सत्य है।

हम रानी पद्मिनी को 'सती' मान के उसका गौरव करते हैं ! इतिहास उन 'हजारों पद्मिनिओं ' का गौरव करता है..लेकिन जब एक साधारण -सी औरत, दूसरों को कष्ट न पहुँचे, इसलिए अपने जीवन का अंत कर लेती है,तो उसे क्यों दोषी समझा जाता है? एक तो उसने अपने जीवन हाथ धो लिए, और उसीपे इल्ज़ाम? ऐसा क्यों?

तो आईये,आपको हालातों से वाबस्ता करा दूँ।

ये लडकी एक खुले विचारों वाले परिवार में पली बढ़ी। माँ एक दक्षिण भारतीय ब्रह्मिण परिवार से थी..पिता मुस्लिम।

भाई का ब्याह जिस लडकी से हुआ था, वो लडकी भी इसी तरह, दो भिन्न परिवेश से आए माता -पिता की कन्या थी/है। माँ अँगरेज़। पिता पाकिस्तानी मुस्लिम।

जिस महिला ने खुदकुशी की उसे हम तसनीम नाम से बुला लेते हैं। तसनीम का ब्याह एक इंजिनियर से हुआ जो, तसनीम के पिता की ही कंपनी में कार्यरत था। उसे तसनीम की पारिवारिक पार्श्व भूमी से अच्छे तरह वाबस्ता कराया गया। तसनीम के पिता की अच्छी जायदाद थी।

ब्याह के बाद लड़केने जिस भारतीय कंपनी में वो कार्यरत था( एक मशहूर टाटा कंपनी थी), वहाँ से नौकरी छोड़ दी और सउदी अरेबिया चला गया। कुछ माह वहाँ काम किया, और फिर अमेरिका चला आया। वहाँ उनकी एक बेटी का जनम हुआ। शादी के तुंरत बाद, तसनीम पे ये तोहमत लगना शुरू हो गयी,कि, वो तो 'सही मायनेमे' मुस्लिम हैही नही..माँ जो हिंदू परिवार से थी....!

तसनीम पे ज़बरदस्ती होने लगी,कि, वो दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़े। केवल साडी पहने तथा, घरसे बाहर निकलते समय एक मोटी चद्दर ओढ़ के निकले। उसने येभी करना शुरू किया, लेकिन ताने देना, मानसिक छल और साथ ही साथ शारीरिक छल जरी रहा।

तसनीम अपने पिता के घर आयी तब उसने ये बातें अपने परिवार को बता दी। उसे समझा बुझा के वापस भेज दिया गया..ऐसा होता है..ठीक हो जाएगा..अदि,अदि..उसकी भाभी,( सुलताना), जिसकी अपनी माँ अँगरेज़ थी, घबरा गयी,कि, कहीँ ननद भारत में ही रहने आ गयी,तो मेहमानों वाले कमरेमे वो रहेगी...जब उसके पीहर वाले आएँगे तो उन्हें कहाँ रुकाया जाएगा?

सुलताना का रवैय्या अपनी ननद के प्रती बेहद कटु हो गया। ये सब मै क़रीब से देख रही थी...बलिक,सुलताना ने ये तक कह दिया,कि , गर, तसनीम उस घर में रहेगी तो वो अपने माँ-बाप के घर चली जायेगी!

तसनीम की माँ बेहद समझदार, सुलझी हुई महिला थी। उसने एक बार भी अपनी बहू को उलाहना नही दी...विडम्बना देखिये..सुलताना जिस घरमे रह रही थी, वो घर उसके ससुर का। उसकी ननद का मायका..गर एक लडकी, मानसिक तथा शारीरिक परेशानी में अपने माँ बाप के पास नही आयेगी तो कहाँ जायेगी? और ख़ुद सुलताना ने भी तो वही करनेकी घरवालों को धमकी देदी...! अपने ख़ुद के माँ-बाप के घर चले जानेकी...! तसनीम ने यहाँ तक कहा,कि, उसे अगर, उसी शहर में, दूसरा, घर ले दिया जाय तो वो वहाँ चली जायेगी। नौकरी कर लेगी...

इन सब हालातों के चलते, तसनीम ने एक और बच्चे को जन्म दे दिया। अबके पुत्र था। उसे परिवार यहीँ पे रोकना था,लेकिन, पतिदेव राज़ी नही हुए ! तसनीम पे अत्याचार जारी रहे..वो ४ बार भारत लौटी, लेकिन चारों बार उसपे दबाव डाला गया,और वापस भेज दिया गया..वो जब भारत भी आती,तो, मुंबई की तपती, उमस भरी गरमी में एक मोटी चद्दर लेके बाहर निकलती।

आख़री बार जब वो आयी तो, बच्चों को मुंबई की एक स्कूल में दाखिला दिलाया गया। बेटा तो मानो एक फ़रिश्ता था..उसकी माँ जब उसे स्कूल से लेने आती तो उसे चूम के कहता," अम्मा तुम को मेरे लिए इतनी गरमी में आना पड़ता है,हैना? "

ये आँखों देखा क़िस्सा सुना रही हूँ। बच्चों के आगे खाने के लिए जो रखा जाता,चुपचाप खा लेते। लेकिन, भाभी को किसी भी तरह से ननद का उस घर में रहना बरदाश्त नही हो रहा था। तसनीम हर तरह से घरमे हाथ बटाती...अपने तथा अपने भाई के बच्चों को स्कूल से लाना ले जाना उसी के ज़िम्मे था। उसने ये तक कहा,कि, गर उसकी कहीँ और शादी कर सकते हैं,तो उसके लिए भी राज़ी हूँ...

इसपे भाभी ने कह दिया," दो बच्चों की माँ के साथ कौन ब्याह करेगा"?

तसनीम डिप्रेशन में जाती रही। उसने ये भी सुझाया कि, उसे किसी मानो वैज्ञानिक के पास भेजा जाय तो ठीक रहेगा...लेकिन, ये सब, उस परिवार के बड़ों को ( माँ को तो था), मंज़ूर नही था। ख़ास कर, भाई भाभी को...लोग क्या कहेंगे? अलावा, पैसे खर्च होंगे...जबकि, पैसे तो तसनीम के पिता देते!

उसके बच्चों को कोई प्यार करता या तोह्फ़ा देता, पर साथ ही साथ, सुलताना के बच्चों को नही देता,तो घरमे कुहराम मच जाता..तसनीम इसी मे बेहतरी समझती, कि, तोह्फ़ा चुपचाप अपने भाई के बच्चों को पकड़ा दिया जाय..उसके अपने बच्चे इतने समझदार थे,कि, कभी चूँ तक नही करते...! तसनीम की मानसिक स्थिती की गंभीरता समझने को जैसे कोई तैयार ही ना था..

क्रमश:

अगली किश्त मे क़िस्सा पूरा कर दूँगी। विषय की गहराई मे गयी, ताकि, तसनीम को आत्म हत्या करने पे मजबूर करने वाले हालात सामने रख सकूँ..

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

अर्थी तो उठी...

चंद वाक़यात लिखने जा रही हूँ...जो नारी जीवन के एक दुःख भरे पहलू से ताल्लुक़ रखते हैं....ख़ास कर पिछली पीढी के, भारतीय नारी जीवन से रु-ब-रु करा सकते हैं....

हमारे मुल्क में ये प्रथा तो हैही,कि, ब्याह के बाद लडकी अपने माता-पिता का घर छोड़ 'पती'के घर या ससुराल में रहने जाती है...बचपन से उसपे संस्कार किए जाते हैं,कि, अब वही घर उसका है, उसकी अर्थी वहीँ से उठनी चाहिए..क्या 'वो घर 'उसका' होता है? क़ानूनन हो भी, लेकिन भावनात्मक तौरसे, उसे ऐसा महसूस होता है? एक कोमल मानवी मन के पौधेको उसकी ज़मीन से उखाड़ किसी अन्य आँगन में लगाया जाता है...और अपेक्षा रहती है,लडकी के घर में आते ही, उसे अपने पीहर में मिले संस्कार या तौर तरीक़े भुला देने चाहियें..! ऐसा मुमकिन हो सकता है?

जो लिखने जा रही हूँ, वो असली घटना है..एक संभ्रांत परिवार में पली बढ़ी लडकी का दुखद अंत...उसे आत्महत्या करनी पडी... वो तो अपने दोनों बच्चों समेत मर जाना चाह रही थी..लेकिन एक बच्ची, जो ५ सालकी या उससे भी कुछ कम, हाथसे फिसल गयी..और जब इस महिलाने १८ वी मंज़िल से छलाँग लगा ली,तो ये 'बद नसीब' बच गयी... हाँ, उस बचने को मै, उस बच्ची का दुर्भाग्य कहूँगी....

जिस हालमे उसकी ज़िंदगी कटती रही...शायद उन हालत से पाठक भी वाबस्ता हों, तो यही कह सकते हैं..
ये सब, क्यों कैसे हुआ...अगली किश्त में..गर पाठकों को दिलचस्पी हो,तभी लिखूँगी...क्योंकि, यहाँ एक सँवाद हो रहा है..बात एक तरफ़ा नही...आप सवाल करें तो मै जवाब दूँ...या मै सवाल खड़ा करूँ,तो आप जवाब दें!

सोमवार, 17 अगस्त 2009

सुगंधित फूल बन जाओ

तपन लू की जो हरियाली उठाकर ले ही जाएगी
घटा भी सागरों का जल उड़ाकर ले ही जाएगी

सुगंधित फूल बन जाओ, खिलो डाली की बाहों पर
हवा खुशबू की साँसों को बहाकर ले ही जाएगी

सड़क सुनसान है,गश्ती सिपाही सो गए थककर
हमें भी रात की अंतिम घड़ी घर ले ही जाएगी

घरों का सुख कभी भीतर अहाते के नहीं मिलता
तुम्हें घर की ज़रूरत घर से बाहर ले ही जाएगी

तुम अपने आप पर विश्वास करना सीख लो वर्ना
परेशानी तुम्हें औरों के दर पर ले ही जाएगी

डा. गिरिराज शरण अग्रवाल

रविवार, 16 अगस्त 2009

घरकी लक्ष्मी...या?

बड़ा दुःख होता है,जब लडकी के जनम के बाद घरमे एक मातम-सा मनाते देखती हूँ..कई कहानियाँ जानती हूँ, जहाँ चार चार बेटों की माँ दरबदर भटकी..घरसे धक्के मार के निकाली गयी.....

घरकी लक्षी' कहलाने वाली औरत, हमेशा 'पराया धन' बनी रही..ना अपने ससुराल में पैर रखनेको हक़ की ज़मीन हासिल, ना नैहर में...! जाए तो कहाँ जाए...?

"woman's day" पे लिखी,अपनी ही एक रचना पेश कर रही हूँ...!

एक बगिया बनाएँ...

जब एक बूँद नूरकी,
भोलेसे चेहरे पे किसी,
धीरेसे है टपकती ,
दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,
मुसकाती हैं होटोंकी,
वही तो कविता कहलाती!

क्यों हम उसे गुनगुनाते नही?
क्यों बाहोंमे झुलाते नही?
क्यों देते हैं घोंट गला?
करतें हैं गुनाह ऐसा?
जो काबिले माफी नही?
फाँसी के फँदेके सिवा इसकी,
दूसरी कोई सज़ा नही??

किससे छुपाते हैं ये करतूते,
अस्तित्व जिसका चराचर मे,
वो हमारा पालनहार,
वो हमारा सर्जनहार,
कुछभी छुपता है उससे??
देखता हजारों आँखों से!!
क्या सचमे हम समझ नही पाते?

आओ, एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
मत असमय चुन लेना,
इन्हें फूलने देना,
एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

आईये हाथ उठायें हम..मिलके..!

नीरज जी,
आपने तो मुझे एक आव्हान ही दे दिया! अब कैसे मुकर जाऊँ?

एक सवाल पूछती हूँ, आप सभीसे...जो बेहद सामायिक है...हमारी सुरक्षा से निगडित है..हम सभी को इसका जवाब खोजना है.. इसका सामना करने की निहायत ज़रूरत है...वो आतंक वाद को लेके...!

क्या आपलोग Indian Evidence Act २५/२७ के बारेमे जानते हैं? जानते हैं,कि, इसके क्या दुष्परिणाम हैं? के ये १५० साल पुराना, अंग्रेजों ने ख़ुद को बचाए रखने के लिए बनाया क़ानून आज पूरी दुनिया के लिए समस्या बन गया है? हमें निगल रहा है और हम हाथ पे हाथ धरे बैठे है? आख़िर क्यों? हमारी आज़ादी की सालगिरह हमें आतंक के साये में मनानी पड़ती है..आख़िर कबतक?

के, अर्न्तगत सुरक्षा यंत्रणा के हाथ मज़बूत करने के लिए दिए गए सुझाव,उच्च तम न्यायलय के आदेशों के बावजूद पिछले २९ सालों से लागू नही किए गए?

के, जबतक इन क़ानूनों में तब्दीलियाँ नही आतीं, हम आतंक से महफूज़ नहीँ? के अफ़ीम- गाँजा की तस्करी भी जारी रहेगी और हम मुँह तकते रहेंगे?

ये सभी सवाल,एक ही सवाल के तहत हैं...हम हमारे देशकी कानून व्यवस्था के बारेमे कितनी जानकारी रखते हैं? ख़ास कर जहाँ तस्करी से निपटने का प्रश्न आता है ???

हम एक बारूद के ढेर पे बठे हुए हैं/रहेंगे...और निगले जायेंगे,जब तक जागरूक नही बनेंगे....एक लोक तंत्र में सबसे अधिक लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है..आईये ! हम कुछ करें...मिलके..!

शमा

खुला मंच: एक सवाल तुम करो

मनुष्य का हृदय छोटी-छोटी बातों से उद्वेलित होता रहा है और जब तक जिन्दगी है ब्रह्माण्ड में होता ही रहेगा...
यही छोटी बातें जिन्दगी, समाज, व्यवहार, संस्कृति, साहित्य, राजनीती, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि-इत्यादि में परिवर्तन लाती रही हैं...
शमा जी और मैंने इसी कारण से इस ब्लॉग की शुरुआत की है जहाँ इन बातों पर चर्चा करेंगे और आशा करते हैं आप सभी ब्लोग्गर्स इसमे शामिल होंगे और इसे एक मंच का रूप प्रदान करेंगे...
इस चिट्ठे में हमारा विषय तथ्यपरक एवं विचारोत्तेजक तो होगा परन्तु किसी भी ब्लोग्गर के विचारों पर व्यक्तिगत टिपण्णी नहीं करेंगे...
प्रथम पोस्ट शमा जी ही लिखेंगी क्यूंकि इस ब्लॉग की परिकल्पना उनकी ही है...उम्मीद है १५ अगस्त को पहली रचना हम सभी को पढने को मिलेगी...
आप सभी का स्वागत है इस मंच पर...कृपया आकर अपना अमूल्य सुझाव एवं सवाल अवश्य दें...

बुधवार, 12 अगस्त 2009

एक बात है मन में...

कई बातें मन में एक सवाल खड़ा कर देती हैं...ऐसा क्यों हुआ..वैसा क्यों नही हुआ...? गर ऐसा होता तो...!
इसी लिए आमंत्रण है दोस्तों को...के पर्यावरण,या फिर अपने समाज और देशसे निगडित सवाल और जवाबों का सिलसिला शुरू हो...

इसका एक और विभाग बनेगा:" आईये हाथ उठायें हम भी..."...इसमे सकारात्मक सुझाव दिए जा सकते हैं...जो लाभदायक हों देश के लिए समाज के लिए..तथा क़तई 'blame game' ना हो..जो हम एक जुट होके या अपने आप से कर सकते हैं, वही सुझाव रहें..

नाही अन्य ब्लॉगर दोस्तों पे टीका टिप्पणी।

आशा करते हैं, इसमे दोस्तों का योगदान ज़रूर मिलेगा!

एक सवाल तुम करो..!

आप अपने सवाल करें...जो सामाजिक,पारिवारिक,या देश हित्से सरोकार रखते हों..किसी अन्य ब्लॉगर पे टीका टिप्पणी न हो इतना ध्यान रहे॥! आगाज़ का इंतज़ार है!