मंगलवार, 22 नवंबर 2011

चलें बातें करें...

आज से पार्लियामेंट का शीतकालिन अधिवेशन आरंभ हो रहा है... कई मुद्दे हैं- महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, डावाँडोल अर्थव्यवस्था। उधर मायावती जी ने उत्तर प्रदेश के विभाजन का नया दांव खेल दिया है। मैं इस ब्लाग पर वापस आया क्योंकि मुझे लगा कि इन बातों का हमारे जीवन पर सीधा असर पड़ता है लेकिन हम कतराते रहते हैं, पता नहीं क्यों? तो चलें बातें करें...

बुधवार, 26 मई 2010

इंसाफ की उम्मीद ......

रूचिका केस में राठौर को की सजा बढाये जाने से उन लोगो को कुछ राहत मिली होगी जिनका कानून व्यवस्था पर से भरोसा समाप्त हो चला है ।अदालत के इस फैसले से उसके परिजन खुश है कि उन्हे इंसाफ मिला पर सोचने वाली बात तो यह है आखिर 1990 में 15 वर्षीय बालिका के साथ राठौर ने छेडछाड की वह भी जो कि खुद पढे लिखे है कहते है इन्सान के अन्दर जानवर होता है उनका जानवरपन जगा क्या हासिल हुआ एक प्रतिभा जो शायद समाज को क्या कुछ देती दुनिया से चली गयी वह क्यों रहती ऎसे समाज में जहां उसके साथ ऎसा हुआ जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या समक्षे लोग ? उस पर उन्हे अपने इन कारनामों पर कुछ फर्क नही पडता क्या पढ लिख कर वह इसलिए डीजीपी एसपीएस बने ताकि ऎसे शर्मनाक काम करे वह भी नाबालिक के साथ,कुछ ही समय बाद उसे आत्महत्या करने पर मजबूर होना पडा, क्या बीतती है ऎसे माता-पिता व परिजनों पर जब उनकी बच्चियों के साथ ऎसा होता है । 20 साल चली इस लडाई मीडिया का अहम रोल रहा । अभी लोग आश्वस्त नही कि राठौर को सचमुच जेल जाना पडेगा वह कुछ न कुछ विकल्प ढूढ ही लेगे । शिक्षित व्यक्ति ऎसे कार्य करे तो वह माफी के काबिल है भी नही उसका गुनाह कम नही जो सजा अदालत ने उसे सुनायी है वह बहुत कम है समाज में रहने वाले एसे लोगो ऎसी सजा मिलनी चाहिए कि वह अपनी पद शक्ति का दुरूपयोग न कर सके और यह न समझे कि वह कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है कानून सभी के लिए बराबर है । तभी उन लडकियों में भी हिम्मत हौसला आयेगा जीवन में आगे बढने का साहस कर पायेगी ।नही तो कोई न कोई राठौर उनसे उनके जीवन का हक छीन उन्हे आत्म हत्या करने पर मजबूर कर देगा हमारी बच्चियों का हौसला न टूटे। इसके लिए कानूनों में सख्ती व बदलाव की भी आवश्यकता है नही तो क्या फायदा उन कानूनों का जो गुनाह करने वालो का ही हिमायती बने? उम्मीद है मीडिया इस तरह की मुहिम जारी रखे ताकि उन लोगो को इंसाफ मिल सके जिन्हे अपने पद व शक्ति के रोब की धोस दिखाते लोग कमजोर लोगो को दबाते है ।

बुधवार, 10 मार्च 2010

भारत-माता: जय हो!!!

महिलाओं को बधाइयाँ...और शुभकामनायें... पता नहीं क्यों मैं आरक्षण का विरोधी होते हुए भी महिला आरक्षण विधेयक के पास होने का इन्तजार कर रहा था... इसका कारण यही है कि जब सभी जाति-जनजातियों को आरक्षण मिल ही रहा है तो समाज के आधे हिस्से को जो सबसे ज्यादा पिछड़ा है, अनेक प्रकार के बन्धनों से जकड़ा है उसे क्यों नहीं आरक्षण मिले!!!

जानता हूँ कि राज्यसभा में बिल का पास होना कोई अचीवमेंट नहीं है, लोकसभा में इसका पास होना एक परीक्षा होगी सरकार के लिए, राजनीतिक दलों के लिए, देश की  प्रगतिशील महिलाओं एवं महिला संगठनो के लिए... लेकिन मुझे हमेशा से सोनिया गाँधी में यकीं रहा है क्योंकि मैं मानता हूँ कि भारत की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को उन्होंने ही पुनर्जीवित किया और अपने दल की भलाई के लिए प्रधानमंत्री पद का त्याग भी कर दिया... हमारे आदरणीय अटल बिहारी वाजपेई भी पद लोभ से खुद को बचा नहीं पाए थे... अब यह कहना कि वास्तव में सोनिया जी ही प्रधानमंत्री हैं लोगों की संकुचित मानसिकता का परिचायक है... ऐसा तो कितने ही पुरुष किया करते है... लालू प्रसाद सबसे बड़े उदाहरण हैं इसके... हाह! सोनिया जी को हार्दिक बधाई इस बिल को आगे ले जाने के लिए...

राज्यसभा में दो दिनों तक जो हुआ वह परिचायक है राजनीति के पतन का... लोगों को समझना होगा कि हम आखिर किन्हें भेज रहे है संसद में... राजनीति कोई गाय-भैंस नहीं है जिसे लाठी के बल पर हांका जाये... इसलिए हमें सोचना होगा कि चुनाव करने का हक हमें मिला है तो सोच-समझ कर वोट डालें... अंतत: जो हुआ वह अनुचित नहीं था क्योंकि जिसे जो भाषा समझ में आये उसी में समझाना पड़ता है... मुंह से कोई भी बोले कि वो महिला आरक्षण के विरोधी नहीं है, सच यही है कि उन्हें अपनी गद्दी छूटने का डर सताने लगा है... मेरे ख्याल से लोकसभा में भी बल प्रयोग करने की आवश्यकता पड़े तो करना चाहिए... लोकतंत्र चलता है बहुमत से और अल्पमत पक्ष को अधिकार नहीं है कि बलप्रयोग से कार्य रोकें... उनकी जो मांगे है उन्हें लोकतान्त्रिक तरीके से संसद के बाहर और भीतर पेश किया जाना चाहिए...

यह बिल महिला सशक्तिकरण का एक अच्छा प्रयास है... एक तिहाई सीटों पर महिलाएं होंगी तो सदन में उनकी आवाज कुछ तो सुनी जाएगी... विरोध के लिए विरोध करना हो तो यह कहा जा सकता है कि अगली बार वह सीट आरक्षित नहीं रहेगा तो महिलाओं को आपने क्षेत्र से लगाव नहीं  होगा... परन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि एक सीट पर २०-३० उम्मीदवार तो चुनाव लड़ेंगी ही और कम से कम दो-तीन महिलाएं तो होंगी जो योग्य और वास्तविक उम्मीदवार होंगी... और अगली बार चुनाव लड़ने की मनाही तो नहीं ही होगी... यदि उन्होंने कार्य किया और लोगों ने पसंद किया तो उनकी उम्मीदवारी अगले बार भी संभव है... इसलिए उनके लिए दरवाजा बंद नहीं होगा... मेरे विचार में इस प्रकार पंद्रह वर्षों लगभग ५०% तक महिला सांसद लोकसभा में दिख सकती हैं... वाह स्वप्नदर्शी...

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

मनाओ होली सब संग......


महकते खिलते टेसू के फूल
उडते बिखरते गुलाल
छीटें पानी की ...............
कुछ ऎसी ही यादें होली की
किल्लारी मचाती बच्चों की फौज
भागते लिए हाथों गुब्बारों का झोल
कुछ ऎसी ही यादें होली की............
मौसम की बदलती रंगत
कुछ कहते कुछ सुनते
गुनगुन कानों में अल्पविराम
कुछ ऎसी ही यादे होली की........
भुल जाओ हर गम
हर बैर -भाव
याद करों बचपन के वो दिन
मनाओ होली सब संग........
....।